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जब अध्यक्ष ही बोझ बन जाए

नई दिल्ली

Updated Tue, 06 Nov 2012 09:40 PM IST
when president becomes a burden
भाजपा कदाचित अकेली राजनीतिक पार्टी है, जो अपने अध्यक्ष के कारण भी मुसीबत में फंसती है। घूस लेते हुए कैमरे में पकड़े जाने, और जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने के कारण अतीत में क्रमशः बंगारू लक्ष्मण और लालकृष्ण आडवाणी की कुरसी जा चुकी है। उन दोनों को तो अपनी एक 'गलती' की सजा भुगतनी पड़ी थी, जबकि नितिन गडकरी पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद से ही लगातार गलत वजहों से सुर्खियों में हैं।
जो पार्टी चाल, चरित्र और चेहरे की बात करती है, जो पार्टी कभी अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के दिशा-निर्देशों में चल चुकी है, उस पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष ने जिम्मेदारी संभालते ही अशोभनीय टिप्पणियों की बौछार कर दी थी। किसी सत्ताधारी नेता को औरंगजेब की औलाद बताना, किसी आतंकवादी को कांग्रेस का दामाद बताना, किन्हीं नेताओं के व्यवहार की तुलना कुत्ते से करना उन टिप्पणियों के कुछ नमूने हैं।

अब हाल में बौद्धिक क्षमता पर बात करते हुए उन्होंने स्वामी विवेकानंद और दाऊद इब्राहिम की जिस तरह मिसाल दे डाली, वह एक बार फिर बताता है कि गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने लायक नहीं हैं। हिंदुत्व की राजनीति करने वाला दल विवेकानंद और दाऊद को एक साथ जोड़े, यह अकल्पनीय है। गडकरी ने इसका भी ध्यान नहीं रखा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी ने विवेकानंद की रैली से चुनाव अभियान की शुरुआत की थी।

अंदरूनी सत्ता-संघर्ष में उलझी भाजपा की मुश्किल यह है कि वह अपनी मातृ संस्था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि संघ द्वारा तय किए गए अध्यक्ष को स्वीकारना जिस तरह उसकी मजबूरी था, आज उसी अध्यक्ष को विवादों के बावजूद समर्थन देना उसकी विवशता है। पार्टी के शीर्ष पद पर रहते हुए गडकरी ने यदि आचरण और भाषण में संयम का परिचय दिया होता, तो आज उनकी यह स्थिति नहीं होती। पार्टी के भीतर उनके विरोध की एक वजह यह भी है कि उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यह सही है कि गुजरात के चुनाव को देखते हुए पार्टी के अध्यक्ष पद से गडकरी की तत्काल विदाई का भाजपा को नुकसान ही ज्यादा होगा, लेकिन इतने विवादों के बाद अब उन्हें दूसरा कार्यकाल न देना ही उचित होगा।
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