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कुनबे में कलह

नई दिल्ली

Updated Wed, 29 Jan 2014 07:51 PM IST
war in karunanidhi family
अपने राजनीतिक जीवन के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे एम करुणानिधि के लिए 2014 के आम चुनाव सबसे अहम हैं, लिहाजा उन्होंने द्रमुक को बचाए रखने के लिए अपने बड़े बेटे अलागिरी तक को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में गुरेज नहीं किया है। उनके इस कदम से पार्टी आसन्न लोकसभा चुनाव में अपना संभावित नुकसान कितना कम कर पाएगी, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि अलागिरी लंबे समय से पार्टी के लिए परेशानी का सबब बने हुए थे।
बेशक, यह करुणानिधि की वंशवादी राजनीति का ही हासिल है कि अलागिरी अपने छोटे भाई स्टालिन को अपने राजनीतिक मंसूबों के लिए सबसे बड़ा रोड़ा मान रहे हैं। हालत यहां तक पहुंच गई है कि करुणानिधि को स्टालिन की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री से गुहार लगानी पड़ रही है; और दोनों भाइयों के समर्थक सड़कों पर भिड़ रहे हैं! वास्तव में यह पारिवारिक झगड़ा उसी वक्त सार्वजनिक हो गया था, जब करुणानिधि ने स्टालिन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

इसमें दो राय नहीं कि स्टालिन अलागिरी के मुकाबले कहीं अधिक परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं, बल्कि पार्टी के भीतर और बाहर उनकी स्वीकार्यता भी अधिक है। इसके अलावा कालांतर से अलागिरी पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलग्न थे। वह पार्टी के जिस साउथ जोन के सचिव थे, वहां भी द्रमुक की हालत काफी खराब होती गई है। यही नहीं, वह पार्टी के हित में लिए जा रहे फैसलों से भी इत्तफाक नहीं रख रहे थे। मसलन, उन्होंने द्रमुक और विजयकांत की पार्टी डीएमडीके के गठबंधन पर हो रही वार्ता का न केवल सार्वजनिक विरोध किया, बल्कि वह अपने समर्थकों के साथ अलग से द्रमुक की जनरल काउंसिल की बैठक बुलाने तक की तैयारी कर रहे थे।

असल में 2011 के विधानसभा चुनाव में ही पार्टी की हालत खराब हो गई थी, जब डीएमडीके के बाद उसे तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा था। उसके बाद से पार्टी का परोक्ष रूप से संचालन स्टालिन ही कर रहे हैं। मगर ऐसे समय जब राजनीतिक विमर्श और चुनावी आकलनों में राज्य की स्थितियों को जयललिता की अन्नाद्रमुक के अनुकूल बताया जा रहा है, करुणानिधि की परेशानी कम होती नहीं दिख रही है।
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