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नॉर्वे से सबक लीजिए

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 03 Dec 2012 07:54 AM IST
take lessons from Norway
बीते करीब छह महीने में यह दूसरी बार है, जब अपने बच्चों के साथ सुलूक के कारण भारतीय दंपति नॉर्वे सरकार के निशाने पर है। बच्चों का ठीक से पालन-पोषण नहीं करने के आरोप में पिछली बार एक दंपति को उनके बच्चों से अलग कर दिया गया था, तो इस बार अपने बेटे को डांटने-फटकारने के जुर्म में माता-पिता हिरासत में हैं। सरसरी तौर पर ये घटनाएं व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप की तरह लग सकती हैं, जबकि हकीकत में ये हमारे लिए सबक हैं।
एक सबक तो यही है कि विदेशों में रहते हुए हम वहां के कायदा-कानूनों का सम्मान करना सीखें। भूमंडलीकरण के इस दौर में हम रोजगार के लिए दूसरे देशों में चले तो जाते हैं, लेकिन वहां के सामाजिक नियमों का पालन करने की जहमत नहीं उठाते। अपने देश में बच्चों का पालन-पोषण भले ही कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन यूरोप और अमेरिका में बच्चे पालते हुए स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

इसी तरह विकसित देशों में मानवाधिकार सिर्फ फांसी को प्रतिबंधित करने तक सीमित नहीं है, वह पारिवारिक डांट-डपट और पिटाई तक को अपराध मानता है। सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल चंद्रशेखर और उनकी पत्नी को नॉर्वे के कानून के मुताबिक दंड का पात्र पाया गया, क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे को धमकाया था। असल में जैसे-जैसे हमारा समाज आधुनिक होता जाता है, वह हिंसा को उतना ही खारिज करता जाता है। फिर पारिवारिक हिंसा बच्चों की मानसिक बुनावट पर भी असर डालती है।

विकसित देशों में बच्चों को धमकाने या उन्हें पीटने को अपराध की श्रेणी में रखा गया है, तो इसका कारण यही है। दूसरी ओर हमारा समाज है, जहां पिटाई और डांट-डपट अभिभावकों के परम कर्तव्य माने गए हैं। कानून के डर से स्कूलों में पिटाई के मामले भले ही कम हो गए हों, पर घरों में बच्चों के प्रति क्रूरता में कमी नहीं आई है। हम शायद ही सोचते हों कि बच्चों को डांट-डपटकर या उन्हें पीटकर हम मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। चूंकि हमारा समाज उतना जागरूक नहीं हुआ है, इसलिए बच्चों के उत्पीड़न के कई मामले अनसुने रह जाते हैं। बेहतर होगा कि नॉर्वे की इन घटनाओं पर क्षुब्ध होने के बजाय हम बच्चों के मामले में उससे थोड़ी संवेदनशीलता सीखें।
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