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पारी समाप्ति की घोषणा क्यों नहीं!

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Tue, 27 Nov 2012 08:56 PM IST
retirement why not
अब क्रिकेट में हर पराजय के बाद सचिन रमेश तेंदुलकर के संन्यास की मांग उठना उतना आश्चर्यजनक नहीं है, जितनी इसकी अनदेखी हैरतनाक होगी। मुंबई में इंग्लैंड के खिलाफ करारी हार के लिए बेशक सचिन अकेले जिम्मेदार नहीं, लेकिन यह तर्क टीम में उन्हें बनाए रखने का आधार भी नहीं हो सकता।
सबसे ज्यादा इसलिए कि क्रिकेट में प्रतिभा और पराक्रम का जो प्रदर्शन सचिन ने पिछले तेईस वर्षों में किया है, हालिया खेल उसकी छाया भी नहीं है। क्रिकेट की कोई उपलब्धि उनसे अछूती नहीं रही, ऐसे में अब सिर्फ खेलने के लिए खेलते रहने का कोई औचित्य नहीं है।

जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को सुनील गावस्कर की रक्षात्मक बल्लेबाजी से आगे निकालकर आत्मविश्वास भरी विस्फोटक बल्लेबाजी का पर्याय बनाया, जिन्हें नब्बे की पारी भी कभी रोमांचक शॉट खेलने से रोक नहीं पाई, जो विश्व कप जैसे मुकाबले के शुरुआती ओवर में पॉइंट के ऊपर से छक्का मारने का साहस कर सकते थे, जिन्होंने बल्लेबाजी प्रतिभा को परिश्रम और अनुशीलन के साथ जोड़ा, क्रिकेट को जिन्होंने कई नए और अनूठे शॉट दिए, जिनका विकेट हासिल करना दुनिया के किसी भी गेंदबाज के लिए तोहफे से कम नहीं था, उन्हें आज एक-एक रन के लिए संघर्ष करते हुए देखना तकलीफदेह ही नहीं है, यह उस खिलाड़ी की छवि से मेल नहीं खाता, जो पिछले करीब ढाई दशकों से अपनी ईमानदारी और मध्यवर्गीय मानसिकता के कारण भी पूजा जाता है।

सचिन ने अपना आखिरी शतक करीब बाईस महीने पहले, और आखिरी अर्द्धशतक दस पारी पहले लगाया था, बल्कि पिछली पांच पारियों में वह चार बार बोल्ड हो चुके हैं। साफ है कि उम्र के उनचालीसवें पड़ाव पर क्रीज पर न तो उनके पांव पहले की तरह चलते हैं, न ही उनकी आंखें गेंद को पहले की तरह परख पाने में सक्षम हैं। उम्र और क्रिकेट की ढलान पर खड़े सचिन का समय अब समाप्त हो चुका है। क्रिकेट के भगवान को संन्यास लेने के लिए कहना कुफ्र नहीं है, बल्कि यह खुद सचिन की छवि के लिए भी अच्छा होगा और भारतीय क्रिकेट के लिए भी। सचिन की जगह कोई नहीं ले सकता, पर टीम इंडिया में चेतेश्वर पुजारा जैसे नए खून को आने दीजिए।




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