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एकांगी विकास का नतीजा

नई दिल्ली

Updated Mon, 12 Nov 2012 10:15 PM IST
result of lop sided development
दीपावली की आतिशबाजी के बीच जारी हुए औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अप्रत्याशित तो नहीं, पर निराशाजनक जरूर हैं। चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीने यानी अप्रैल-सितंबर के दौरान औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर एक प्रतिशत रही, जो बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में 5.1 प्रतिशत थी। औद्योगिक उत्पादन में तकरीबन दो-तिहाई हिस्सेदारी वाले विनिर्माण क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन निराशाजनक आंकड़ों का प्रमुख कारण है।
मौजूदा वित्त वर्ष का आधा सफर पूरा हो जाने के बाद आए इन नतीजों से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का वह आकलन सही साबित होता दिख रहा है, जिसमें कहा गया है कि इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.9 फीसदी रहेगी, जो एक दशक में सबसे कम होगी। त्योहारी मौसम में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट का संकेत साफ है कि अर्थव्यवस्था को उबारने के सरकारी प्रयास नाकाम साबित हो रहे हैं।

वैश्विक अनिश्चितता के बीच घरेलू मांग में कमी के हालात काफी दिन से बरकरार हैं। वैश्विक हालात पर तो हमारा जोर नहीं है, पर घरेलू मांग बढ़ाने की दिशा में भी सरकार ने सिर्फ जुबानी कवायद की है। बेलगाम महंगाई ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। महंगाई के चलते गरीब और निम्न मध्यवर्ग के आय का एक बड़ा हिस्सा खाने-पीने और जीवन-यापन के साधनों में खर्च हो जाता है।

इस तबके के पास ऐसी अतिरिक्त आय नहीं बचती, जिससे वह अन्य उपयोगी मदों के खर्च पूरे कर सके। यह एक दुष्चक्र है। मांग में कमी के चलते औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है, जिससे निवेश प्रभावित हो रहा है, नतीजतन नई नौकरियां नहीं उत्पन्न हो रही हैं। साथ ही महंगाई की तुलना में कामकाजी वर्ग की आय में वृद्धि नहीं हो पा रही है। भारत में एक जनसांख्यिकी उभार देखने को मिल रहा है।

हर साल लाखों लोग कामगार फौज में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में विकास दर में बढ़ोतरी के साथ-साथ महंगाई को काबू में रखने के लिए ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों की जरूरत है। नहीं तो, जनसांख्यिकी लाभ एक शाप बन जाएगा। पिछले दिनों वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पांच साल के भीतर राजकोषीय घाटे को कम करके जीडीपी के तीन फीसदी पर लाने का एक रोडमैप प्रस्तुत किया। बढ़ते राजकोषीय घाटे को लेकर चिंता वाजिब है, पर जिस देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी बसर कर रही हो, वहां आंख बंद करके सबसिडी खत्म करने की कवायद बहुत व्यावहारिक नहीं दिखती।
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