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दोहरी हार से उठे सवाल

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 10 Dec 2012 11:05 AM IST
questions raised after dual defeat
लगातार दो टेस्ट में हार के बाद चयनकर्ताओं ने तीन खिलाड़ियों को बाहर कर जो संदेश देना चाहा है, वह बहुत आश्वस्त नहीं करता। वह इसलिए, क्योंकि टीम का जो हाल है, उसमें कुछ बदलाव भर से बड़ा नतीजा नहीं निकलने वाला। बेशक पूरी टीम को बदल देने का तर्क बचकाना है, पर घर में दो टेस्ट हारने के बाद ये बदलाव बताते हैं कि क्रिकेट के नीति-नियंता या तो रोग की जड़ नहीं पकड़ पाए हैं या जरूरी कदम उठाने से बच रहे हैं। अपनी पिच पर इंग्लैंड के पेस बोलरों की रिवर्स स्विंग ज्यादा मारक है, पनेसर और स्वान की स्पिन गेंदबाजी हमारे बल्लेबाजों के लिए अबूझ है, और इंग्लैंड के कप्तान की बल्लेबाजी के आगे हमारे दिग्गज निष्प्रभ हैं।
जहीर, हरभजन और युवराज की विफलताएं चूंकि साफ दिखती हैं, इसलिए उन्हें बाहर किया गया है, पर क्या सहवाग, गंभीर और सचिन का प्रदर्शन ऐसा है कि उन्हें टीम में रखा जाए? इन तीनों ने बेशक सस्ते में विकेट नहीं गंवाए, लेकिन अर्द्धशतक बना लेने से इनकी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। इनमें से किसी ने अब तक कुक जैसी धैर्यपूर्ण बल्लेबाजी का परिचय नहीं दिया। अश्विन की बल्लेबाजी सुबूत थी कि हमारे स्टार बल्लेबाजों ने लापरवाही में विकेट गंवाए। धैर्य की उम्मीद छोड़िए, हमारे बल्लेबाज लगातार रन आउट हो रहे हैं! बल्लेबाजी में फिर भी वरिष्ठों का विकल्प खोजा गया है, पर गेंदबाजी में जहीर जैसों का स्थानापन्न ढूंढने की कोशिश नहीं दिखती।

जिन धोनी को अब तक चतुर और ठंडे दिमाग वाला कप्तान बताया जाता रहा है, उनकी विफलता से साफ है कि जीत कप्तान के निर्णयों से अधिक सामूहिक उपलब्धियों का नतीजा होती है। सिर्फ यही नहीं कि पूरी सीरीज में धोनी की बैटिंग कभी निर्णायक नहीं रही, यह भी कि कोलकाता की पिच को टर्निंग ट्रैक बनाने की उनकी जिद को देखते हुए, जो बेशक पूरी नहीं हुई, यह हार और भी लज्जाजनक है। हैरत तो यह है कि इस पर गंभीरता जताने के बजाय बीसीसीआई के मुखिया ईडन के चीफ क्यूरेटर पर बरस रहे हैं। सवाल तो कोच डंकन फ्लेचर की भूमिका पर भी उठ रहे हैं। टीम इंडिया की छवि इतने निचले स्तर पर पहुंच चुकी है कि अगले टेस्ट में जीत से भी उसकी भरपाई संभव नहीं।
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