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एफडीआई पर राजनीति

नई दिल्ली

Updated Wed, 28 Nov 2012 09:29 PM IST
politics on fdi
अपने आर्थिक फैसलों को आगे बढ़ाने को बेताब यूपीए सरकार यदि संसद में अपने आंकड़े को लेकर आश्वस्त है, तो इसके लिए उसकी नीतियों से कहीं अधिक उसके राजनीतिक प्रबंधकों के कौशल और आज के दौर की राजनीति को जिम्मेदार माना जाना चाहिए।
राजनीतिक विवशताओं के कारण ही अलग-अलग सिद्धांतों और नीतियों वाली पार्टियां आज एक पाले में नजर आ रही हैं। यही वजह है कि कल तक खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मुखालफत करने वाले द्रमुक ने यूपीए के साथ ही रहने का ऐलान किया है, तो एक दूसरे की घनघोर विरोधी सपा और बसपा भी यूपीए की नैया पार लगाने को बेताब हैं। दरअसल यह अगले आम चुनाव की राजनीतिक बिसात है, जिस पर हर कोई अपनी चालें चल रहा है।

बेशक, भाजपा और राजग के उसके साथियों के साथ ही वाम दल शुरू से मल्टी ब्रांड में एफडीआई का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी राजनीति में कभी कोई साम्य नहीं रहा है। यही बात ममता बनर्जी पर भी लागू होती है, वरना तृणमूल कांग्रेस का अविश्वास प्रस्ताव पेश होने से पहले ही ध्वस्त नहीं हो गया होता। इस बहस के बीच सबसे हास्यास्पद तर्क द्रमुक प्रमुख करुणानिधि ने दिया है कि उनकी पार्टी एफडीआई के पक्ष में नहीं है, पर सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखने के लिए वह सरकार के साथ है!

यह विडंबना ही है कि देश के करोड़ों छोटे किसानों और खुदरा व्यापारियों के साथ ही आम उपभोक्ताओं से जुड़े एफडीआई के मसले पर राजनीतिक दल राजनीति से ऊपर उठकर नहीं सोच पा रहे हैं। सरकार का यह तर्क गले नहीं उतरता कि नीतिगत फैसलों पर संसद में मत विभाजन के प्रावधान वाले नियम से बहस होने पर गलत परंपरा शुरू हो जाएगी।

वास्तव में किसी मसले पर नियम 184 के तहत बहस की मांग नई नहीं है, बल्कि दशक भर पहले बाल्को के विनिवेश के फैसले पर इसी नियम के तहत चर्चा कराई गई थी और तब कांग्रेस विपक्ष में थी। शीतकालीन सत्र के शुरुआती चार दिन पहले ही सरकार और विपक्ष की जिद की भेंट चढ़ चुके हैं।

इससे पहले मानसून सत्र को भी कोलगेट ने लील लिया था। यह हमारे समय का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट है कि संसद ही नहीं चल पा रही है।

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