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शक्ति प्रदर्शन की राजनीति

Santosh Trivedi

Santosh Trivedi

Updated Mon, 05 Nov 2012 11:51 AM IST
politics of power show
मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के सबसे बड़े फेरबदल के हफ्ते भर के भीतर हुई कांग्रेस की 'महारैली' को पार्टी और सरकार के शक्ति प्रदर्शन के तौर पर ही देखना चाहिए। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान यह ऐसा पहला मौका है, जब प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी तीनों ने एक मंच से विपक्ष खासतौर से भाजपा पर तीखे हमले किए।
मगर सरकार की आर्थिक नीतियों के संबंध में उन्होंने कोई नई बात नहीं कही और तकरीबन वही बातें दोहराईं, जिन्हें कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता अलग-अलग मंचों से कहते रहे हैं। वैसे भी एफडीआई और लोकपाल के मामले में सरकार की नीयत और नीति के बारे में कुछ भी छिपा नहीं है, बल्कि इस रैली के बाद साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में सरकार कुछ और कड़े आर्थिक कदम उठा सकती है। ममता बनर्जी के यूपीए से अलग होने के बाद निश्चित ही कांग्रेस पहले से कहीं अधिक हमलावर लगती है, लेकिन, महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के बारे में वह देश की जनता को किसी तरह आश्वस्त नहीं कर सकी।

यह नहीं भूलना चाहिए कि इन तीनों ही मुद्दों से आम आदमी सीधे जुड़ा हुआ है, जिनकी वजह से वह पार्टी से दूर हो रहा है। हैरत की बात यह है कि खुद राहुल गांधी इस व्यवस्था से मायूस लगते हैं! मगर, जैसी कि चर्चा है और कांग्रेस प्रवक्ता तक ने माना है कि शीघ्र ही राहुल को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है, तो ऐसे में उन्हें कहीं अधिक राजनीतिक परिपक्वता दिखाने की जरूरत होगी।

वह राजनीतिक व्यवस्था बदलने की बात कर रहे हैं, ऐसी ही बात तो अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल भी कहते आए हैं। बीते आठ वर्ष से तो यूपीए की ही सरकार है और यह व्यवस्था उसके हाथ में है। ऐसा ही हाल बिहार का कहा जा सकता है, जहां सात वर्षों से सत्ता में काबिज नीतीश कुमार राज्य के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए विशेष दरजे की मांग कर रहे हैं।

अफसोस की बात है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली की तरह पटना में जनता दल (यू) की अधिकार रैली राजनीतिक ताकत दिखाने में भले सफल हुई हो, मगर कोई बड़ा संदेश देने में वह भी नाकाम रही। और फिर सिर्फ भीड़ को किसी पार्टी की लोकप्रियता का पैमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि राजनीतिक रैलियों में तो भीड़ अकसर जुटाई जाती है।
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