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संगीत का सितारा

नई दिल्ली

Updated Wed, 12 Dec 2012 09:59 PM IST
Pandit Ravi Shankar was an artistic genius
पंडित रविशंकर ने अभी पिछले महीने ही कैलिफोर्निया में अपनी पुत्री अनुष्का के साथ अंतिम प्रस्तुति दी थी, और उन्हें इस वर्ष ग्रैमी अवार्ड्स के लिए एक बार फिर नामांकित किया गया था। 92 वर्ष की उम्र में संगीत के प्रति अपने इस समर्पण के कारण ही वह जीवित किंवदंती बन गए थे। उनका जाना हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई अब शायद कभी नहीं हो सकेगी।
आठ दशक से भी लंबी उनकी यात्रा को पीछे मुड़कर देखा जाए, तो वह किसी संत की तरह लगते हैं, जिसने अपना सारा जीवन संगीत को समर्पित कर दिया। उन्होंने खुद को खांटी हिंदुस्तानी संगीत की हदों तक बांधकर नहीं रखा, बल्कि नए-नए प्रयोग करने से वह नहीं हिचके, जिससे रिश्तों की भी नई खिड़कियां खुलीं।

येहूदी मैनुहिन के वायलिन या बीट्ल्स के साथ उनके सितार की जुगलंबदी दरअसल ऐसे ही प्रयोग थे। बल्कि यह कहना कि अपने करियर की शुरुआत में ही सरोदवादक अली अकबर खान के साथ 'जुगलबंदी'​ की नींव ही उन्होंने रखी थी, तो गलत न होगा।

निश्चय ही उन्हें अपने बड़े भाई उदय शंकर के बैले ग्रुप के साथ दूसरे समकालीन संगीतकारों या कलाकारों की तुलना में पश्चिमी देशों में घूमने का मौका जरा जल्दी मिला। मगर, सितार के जरिये उन्होंने दुनिया भर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को जो ख्याति दिलाई, वैसा उदाहरण और नहीं मिलता।

रविशंकर ने भारतीय संगीत को इतना कुछ दिया है, जिसे चंद शब्दों में समेटना बहुत मुश्किल है। परमेश्वरी, कामेश्वरी, गंगेश्वरी, वैरागी तोड़ा, मनमंजरी, तिलक श्याम और नट भैरव जैसे न जाने कितने राग उन्हीं की देन हैं। उन्होंने अनेक फिल्मों में भी संगीत दिए।

इकबाल के मशहूर गीत सारे जहां से अच्छा को पंडित रविशंकर ही ने सुरों में ढाला। संगीत के जानकारों का यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि उनकी उंगलियों के स्पर्श से सितार के तार झनझना उठते थे। मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर ने उन्हें याद करते हुए कहा है कि भारत की सॉफ्ट पावर बिजनेस नहीं, बल्कि कला है।

पंडित रविशंकर के योगदान को हम देखते हैं, तो यह बात बिल्कुल सही लगती है। वह जिस ऊंचाई पर खड़े थे, वहां सारे पुरस्कार और अलंकरण छोटे पड़ गए थे। वह सही मायने में भारत रत्न थे।
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