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आतंक के साये में पंचायत

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Tue, 25 Sep 2012 08:33 PM IST
Panchayat in terror
करीब तेईस वर्ष बाद पिछले साल जम्मू-कश्मीर में आतंकी धमकियों के बावजूद पंचायत चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुए थे, तो इसे राज्य में एक बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि बताई गई थी। लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूती देने के लिए तब करीब 2,000 पंचायत प्रतिनिधि चुने गए थे। पर लगभग एक साल के भीतर ही स्थिति पूरी तरह बदल गई है।
पंचायतों को ताकत देने के लिए जो कदम उठाए जाने चाहिए थे, एक साल के दौरान इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई। पंचायत प्रतिनिधियों की मांग थी कि संविधान के 71वें और 73वें संशोधन को व्यापक किया जाए, जिससे कि सरकारी विभागों और प्रशासन के निचले स्तर पर उनकी दखल हो।

लेकिन नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे पर सहमति न बन पाने का नतीजा यह है कि केंद्र से भेजे जा रहे फंड का दुरुपयोग हो रहा है और पंचायतों तक उनका हिस्सा नहीं पहुंच रहा। पंचों-सरपंचों को उनके अधिकार देने में तो कोताही बरती ही गई, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में भी राज्य सरकार अक्षम साबित हुई है।

एक साल के दौरान चार पंचायत प्रतिनिधि आतंकवादी हमले में मारे गए हैं, जिनमें से दो की मौत तो पिछले एक पखवाड़े के भीतर ही, और वह भी बारामूला जिले में, हुई है। जबकि दस से अधिक प्रतिनिधि घायल हुए हैं। नतीजा यह है कि जो लोग पिछले साल पंचायत चुनाव लड़ते हुए भयभीत नहीं थे, अब वे डर के मारे इस्तीफा दे रहे हैं। ऐसे पंचायत प्रतिनिधियों की संख्या साढ़े चार सौ से भी अधिक बताई जा रही है।

जम्मू-कश्मीर में यदि पंचायती संस्था मजबूत हो जाती है, तो इसका नुकसान पाकिस्तान को होगा, क्योंकि तब कश्मीर का मुद्दा उसके हाथ से निकल जाएगा। यही कारण है कि पिछले साल से ही वह इस पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ध्वस्त करने की मुहिम में जुटा है। चूंकि वह पंचायत चुनाव को बाधित नहीं कर पाया, इसलिए चुने हुए प्रतिनिधि अब उसके भाड़े के हत्यारों के निशाने पर हैं।

कायदे से यह पूरा घटनाक्रम राज्य की साझा सरकार की विफलता का सुबूत है, क्योंकि पंचायत प्रतिनिधियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी है। पर वहां तो सिलसिलेवार ढंग से सरपंच और पंचों को निशाना बनाया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर का यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय होना चाहिए।

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