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भ्रष्टाचार में सबका साझा

नई दिल्ली

Updated Fri, 26 Oct 2012 09:19 PM IST
opposition and ruling both in corruption
जब सत्ता और विपक्ष, दोनों भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं, तब कर्नाटक में एक एक्सप्रेस-वे परियोजना में हुई कथित अनियमितता इसलिए भी ध्यान खींचती है कि विशेष लोकायुक्त की अदालत ने इसमें लिप्त जिन 30 लोगों के खिलाफ जांच का निर्देश दिया है, उनमें राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री देवगौड़ा, कृष्णा और येदियुरप्पा शामिल हैं।
बंगलुरू-मैसूर के बीच 111 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे की योजना देवगौड़ा के मुख्यमंत्री काल में बनी थी, जिन्होंने नियम-कानूनों के विपरीत जाकर न सिर्फ 7,000 एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण किया, बल्कि किसानों को पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दिया।

हालांकि सत्ता से बाहर होने पर इन्हीं देवगौड़ा को उन किसानों के हक में आवाज बुलंद करते देखा गया! यह इतनी बड़ी परियोजना थी कि इसके सहमति पत्र पर मेसाचुसेट्स के पूर्व गर्वनर के दस्तखत थे, यानी इसके निर्माण में अमेरिकी इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को भी आना था। लेकिन गैरकानूनी रूप से जमीन अधिग्रहण का नतीजा यह हुआ कि समय पर परियोजना पूरी होना तो दूर, अब तक मात्र 42 किलोमीटर बाहरी सड़क ही बन पाई है, और उसके बारे में भी कहा जाता है कि यह कंकरीट के बजाय कोलतार निर्मित है!

जबरन जमीन अधिग्रहण का नुकसान किसानों को तो भुगतना ही पड़ा, कानूनी बाधाओं के कारण परियोजना अधूरी रह गई, और उसकी लागत भी करीब पांच सौ करोड़ से बढ़कर अनुमानित पांच हजार करोड़ हो गई है। देवगौड़ा के समय इस परियोजना में जो अनियमितताएं बरती गईं, बाद की कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने उनकी जांच के चक्कर में कदाचित इसलिए नहीं पड़ना चाहा होगा कि इसमें बड़ी मछलियों की लिप्तता थी।

यह भ्रष्टाचार में राजनीतिक पार्टियों की मिलीभगत और सोची-समझी चुप्पी का एक और उदाहरण है। हालांकि इस बीच विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के नाम पर इस्तीफा दे दिया है। पर ऐसा क्यों है कि जिन केंद्रीय मंत्रियों पर उंगली उठी है, उनकी नैतिकता नहीं जागी, और कृष्णा को इस्तीफा देना पड़ा? अगर उन्होंने इस रिपोर्ट के आलोक में त्यागपत्र दिया है, तब भी वह काफी नहीं है। कर्नाटक का मामला भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने का ऐसा मामला है, जिसकी पूरी सचाई सामने आनी ही चाहिए।
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