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गुजराल सिद्धांत की जरूरत

नई दिल्ली

Updated Fri, 30 Nov 2012 09:43 PM IST
need gujral theory
इंद्र कुमार गुजराल के निधन से भारत-पाकिस्तान की उस साझा विरासत को धक्का लगा है, जिसकी बुनियाद पर दोनों देशों के रिश्ते टिके हैं। वह उन चुनींदा नेताओं में से थे, जिन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन अविभाजित भारत में शुरू किया था। वह पाकिस्तान के झेलम में पैदा हुए थे और पंजाबी-उर्दू की साझा छाया में पले-बढ़े थे। इसलिए हमेशा पाकिस्तान को लेकर उनका रवैया उदार रहा, उस दौर में भी, जब कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी तल्ख हो गए थे।
जीवन के अंतिम दौर तक वह दोनों देशों के रिश्तों को लेकर काफी संजीदा थे। मगर, इतिहास में उन्हें सिर्फ इसीलिए नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को लेकर उनके उस सिद्धांत के लिए भी जाना जाएगा, जिसे गुजराल डॉक्ट्रिन के तौर पर स्वीकार किया गया है। दरअसल 1990 के दशक में सोवियत संघ के ढहने के बाद के उथल-पुथल भरे दौर में उन्होंने विदेश मंत्री रहते अपने पांच बिंदुओं वाले व्यापक सिद्धांत को आगे किया था।

इस सिद्धांत के मुताबिक बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल, श्रीलंका और भूटान जैसे छोटे देशों से भारत बराबरी की अपेक्षा नहीं करेगा, दक्षिण एशिया का कोई भी देश अपनी जमीन से किसी दूसरे देश के खिलाफ गतिविधियां नहीं चलाएगा, इस क्षेत्र के देश एक-दूसरे की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करेंगे, किसी के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे और विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से निपटाएंगे।

समय की कसौटी पर हम देख सकते हैं कि उनके ये सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। उस दौर में जब अमेरिका वैश्विक व्यवस्था की सूबेदारी अपने हाथ में ले रहा था, तब वह गुजराल ही थे, जिन्होंने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। उनके इस कदम ने ही एनडीए सरकार के समय दूसरे परमाणु परीक्षण का मार्ग प्रशस्त किया था।

वास्तव में गठबंधन की राजनीति के उभार के दौर में प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे गुजराल बौद्धिक किस्म के राजनीतिज्ञ थे, इसलिए कई बार राजनीति के ढांचे में फिट नहीं हो पाते थे। वह आपातकाल के दौर में सूचना प्रसारण मंत्री थे, लेकिन याद नहीं पड़ता कि कभी उन्होंने किसी अलोकतांत्रिक गतिविधि का समर्थन किया हो। बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें मंत्रिमंडल से हटाकर मास्को में राजदूत बना दिया। वह सही मायने में एक कुशल राजनयिक थे, जिन्होंने देश की विदेश नीति को दिशा दी।
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