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इस विराट जीत का मतलब

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Thu, 20 Dec 2012 10:31 PM IST
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नरेंद्र मोदी की गुजरात विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी जीत अप्रत्याशित भले न हो, इसने मौजूदा राजनीति के प्रतिमान जरूर बदल दिए हैं। इस चुनाव के केंद्र में शुरू से मोदी ही थे, जिनके सामने पस्त पड़ी कांग्रेस, अस्तित्व और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहे केशुभाई पटेल और संघ तथा भाजपा के ऐसे भितरघाती थे, जो किसी भी तरह मोदी के आगे बढ़ते रथ को थामना चाहते थे।
मोदी विरोध ने ऐसा अवसरवादी गठजोड़ खड़ा कर दिया था, जिसमें उनके खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरीं निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता को संघ परिवार के कद्दावर नेता केशुभाई पटेल की जीपीपी का समर्थन लेने से भी गुरेज नहीं रहा। मगर मोदी ने साबित किया है कि लगातार दस वर्षों के शासन के बावजूद प्रदेश के लोगों का उन पर विश्वास कायम है।

उनके खिलाफ न तो गुजरात के क्षेत्रीय समीकरणों ने काम किया और न ही उनकी पिछली छवि को उभारने की कोशिशों ने। गुजरात में भाजपा की यह लगातार पांचवीं जीत है, लेकिन मोदी ने जिस तरह यह चुनाव लड़ा, उससे साफ है कि यह पार्टी से कहीं अधिक उनकी जीत है। वर्ना भाजपा को हिमाचल में पराजय नहीं झेलनी पड़ती।

इस विराट जीत के बाद औपचारिक तौर पर पार्टी उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे या नहीं, अब यह साफ हो गया है कि वह भाजपा के नए नेता हैं। यह भी तय है कि भाजपा का अगला अध्यक्ष वही होगा, जो मोदी के साथ चल सके। इस जीत के बावजूद मोदी की दिल्ली की राह कठिन है, क्योंकि उनके नाम पर सहयोगी दलों को मनाना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा, फिर उसे गुजरात में मोदी का विकल्प भी तलाशना होगा।

उनके विकास के मॉडल में आर्थिक समावेश तो दिखाई देता है, पर क्या वह अब समावेशी राजनीति का प्रदर्शन करेंगे? राष्ट्रीय मसलों पर उनके विचारों को अभी कसौटी पर कसा जाना बाकी है। कांग्रेस ने पिछली बार का आंकड़ा जरूर पार कर लिया, लेकिन मोदी का बढ़ता कद उसके लिए बड़ी चुनौती है।

अलबत्ता हिमाचल में कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह की अगुआई में जीत दर्ज कर लाज बचाई है। इस पहाड़ी राज्य के चुनाव ने साबित किया है कि भ्रष्टाचार बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं है। बहरहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि आम चुनाव 2014 से पहले होंगे। लेकिन कांग्रेस चाहे या न चाहे, अब मोदी बनाम राहुल की बहस तेज जरूर हो सकती है।
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