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उनके भविष्य का सवाल

नई दिल्ली

Updated Mon, 22 Oct 2012 01:31 AM IST
editorial 21 oct
बीते करीब दस महीनों से अनियमित उड़ान, लगभग चार हजार कर्मचारियों के महीनों से रुके हुए वेतन और आठ हजार करोड़ रुपये के घाटे को देखते हुए किंगफिशर का यह हश्र तय था। लेकिन उसके इस हश्र से भी ज्यादा दुखद उसके कर्ताधर्ताओं का रवैया है। किंगफिशर का लाइसेंस निलंबित करने के फैसले के बीच विजय माल्या जहां विदेश में हैं, वहीं नए कैलेंडर गर्ल की खोज और लंदन के खुशनुमा माहौल व पब पर सिद्धार्थ माल्या के ट्वीट बताते हैं कि उन्हें भी इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
किंगफिशर की उड़ान पर भले ही रोक लग गई है, लेकिन विजय माल्या की निजी उड़ान और शान-ओ-शौकत पर कोई रोक-टोक नहीं है। पिता-पुत्र के रवैये से कहीं नहीं लगता कि वे किसी के प्रति जवाबदेह भी हैं। इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि निरंतर शाहखर्ची और घाटे की चिंता किए बगैर अंधाधुंध निवेश के कारण ही किंगफिशर आज इस स्थिति में पहुंची है। बल्कि अपनी परिचालन प्रक्रिया और वित्तीय स्थिति सुधारने की योजना के बारे में पूछे जाने पर भी कंपनी ने जैसी चुप्पी साधे रखी, उससे आशंकाएं ही ज्यादा पैदा होती हैं।

यह मान भी लिया कि उसके बंद होने से हवाई किराया बढ़ने के आसार नहीं हैं, क्योंकि हाल के महीनों में उसकी हिस्सेदारी लगातार घटी है, पर यदि मौजूदा गतिरोध इसी तरह बना रहता है, तो अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा, क्योंकि उस पर साढ़े सात हजार करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी है। जहां तक सरकार का सवाल है, तो किंगफिशर मामले में उसकी भूमिका शुरू से ही ठीक नहीं रही। निजी विमानन कंपनी को आर्थिक मदद न देने का उसका फैसला बेशक सही है, लेकिन इस पूरे प्रसंग में उसे मूक दर्शक नहीं रहना चाहिए।

 कंपनी के खिलाफ सख्ती बरतने में देरी कर उसने विजय माल्या की मदद ही की। फिलहाल प्रासंगिक प्रश्न यही है कि किंगफिशर की भविष्य की योजना क्या है। क्या उसके पास, उठकर खड़े होने और बकाया चुकाने की योजना है?​ यदि ऐसा नहीं है, तो कर्जदारों का बकाया चुकाने के अलावा लगभग चार हजार कर्मचारियों के भविष्य का भी गंभीर सवाल है। आने वाले दिनों में किंगफिशर मामला चाहे जो भी शक्ल अख्तियार करता हो, सरकार को ध्यान रखना होगा कि किसी को इसका नुकसान न उठाना पड़े।
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