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नगालैंड में शांति की उम्मीद

नई दिल्ली

Updated Tue, 16 Oct 2012 09:23 PM IST
editorial 16 October
छह दशक पुरानी नगा समस्या से जुड़े तमाम पक्ष अब जिस तरह शांतिपूर्ण समाधान की ओर बढ़ रहे हैं, उसे सिर्फ पूर्वोत्तर ही नहीं, पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है। एक ओर जहां नगा अलगाववादी गुट एनएससीएन (आई-एम) ने न केवल देश के संविधान पर आस्था जताई है, बल्कि वह अब असम, अरुणाचल और मणिपुर जैसे पड़ोसी राज्यों के नगा बहुल इलाकों को मिलाकर ग्रेटर नगालैंड बनाए जाने की मांग से भी पीछे हट गया है।
दूसरी ओर नगालैंड के सभी विधायक क्षेत्र के व्यापक हित में इस्तीफा देने तक को तैयार हैं, ताकि आगामी मार्च में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कोई स्थायी शांतिपूर्ण समाधान तलाशा जा सके। पूर्वोत्तर के राज्यों में सक्रिय रहे अलगावादी गुटों की तुलना में नगा गुटों ने एक समय देश की संप्रभुता के सामने कहीं बड़ी चुनौती पेश की थी।

उनकी सक्रियता आजादी से पहले से जारी थी और देश के आजाद होने से एक दिन पहले 14 अगस्त, 1947 को नगा अलगाववादी ए जेड फिजो ने तो स्वतंत्र नगा तक का ऐलान तक कर दिया था। उसके बाद कई दशकों तक नगा विद्रोही देश की अखंडता के लिए चुनौती बने रहे।

हालांकि 1997 में एनएससीएन (आई-एम) तथा केंद्र के साथ संघर्ष विराम समझौता होने के बाद से अमूमन इस क्षेत्र में शांति कायम है। इस बीच, देश के भीतर और देश से बाहर भी नगा नेताओं- इसाक चिसी सू और टी मुइवा के साथ भारत सरकार की निरंतर बात चलती रही है।

लंबे निर्वासन और पस्त होते हौसलों के बीच नगा नेता देर से ही सही अब देश की अखंडता को स्वीकार करने को तैयार हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इस नाजुक मौके को हाथ से न जाने दे। इसके लिए नगालैंड के सभी विधायकों को भी विश्वास में लेना चाहिए, जिन्होंने दलगत भावना से उठकर नगा नेशनल काउंसिल के मुख्यमंत्री नेफियू रियो के साथ एकजुटता दिखाई है।

देखा जाए, तो गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है, जिसे विभिन्न 'चैनलों' के जरिये नगा गुटों से हो रही बातचीत को अमलीजामा पहनाना है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले दलविहीन सरकार बनाने का प्रस्ताव निश्चय ही अच्छा है। अगर इसमें नगा गुटों के प्रतिनिधि भी शामिल हो जाएं, तो कोई टिकाऊ समाधान तलाशने में मदद मिल सकती है। 
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