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सुधारों के शोर में डरावनी तसवीर

नई दिल्ली

Updated Wed, 10 Oct 2012 09:50 PM IST
Editorial 10 Oct
बीमा, रिटेल और पेंशन क्षेत्र में अपेक्षित सुधारों को मंजूरी के बावजूद अर्थव्यवस्था का अंधेरा छंटने का नाम नहीं ले रहा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ताजा रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो इस साल हमारी विकास दर 4.9 फीसदी रहेगी, जो करीब एक दशक में सबसे कम होगी! ऐसा भी नहीं है कि सुधारों का लाभ अगली छमाही में मिलेगा। रिपोर्ट बता रही है कि बाद के छह महीने का आर्थिक प्रदर्शन शुरुआती छह महीने की तुलना में बदतर रहेगा! व्यावहारिक धरातल पर स्थिति हालांकि बेहतर होती दिखाई देती है। आर्थिक सुधारों के उपाय से विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है, नतीजतन रुपया मजबूत हुआ है।
कच्चे तेल में गिरावट जारी रहे, तो मुद्रास्फीति नीचे आ सकती है। इससे ब्याज दरों में कमी आएगी, जिससे देश में उद्योग का माहौल बनेगा। हालांकि अब भी बढ़ता राजकोषीय घाटा, अपेक्षा से कम कर राजस्व और सबसिडी का विशाल बोझ चिंता के विषय हैं। आईएमएफ के निराशाजनक आकलन, और स्टैंडर्ड और पुअर्स की ताजा चेतावनी का, जिसमें उसने कहा है कि सुधारों के बावजूद भारत की रेटिंग घट सकती है, आशय यह भी हो सकता है कि हमें अब अपनी फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाना चाहिए। इस पर बहस हो सकती है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान और रेटिंग एजेंसियां दबाव बनाने के लिए ऐसा आकलन कर रही हैं, लेकिन खरीफ उत्पादन में करीब ​10 प्रतिशत कमी का आकलन चिंताजनक है।

पैदावार में कमी को हम अकसर गेहूं और चावल उत्पादन में कमी मान लेते हैं, और देश में खाद्यान्न का चूंकि भारी भंडार है, इसलिए यह भी समझ बैठते हैं कि पैदावार घटने का कोई बड़ा असर कम से कम खाद्यान्न की उपलब्धता पर तो नहीं पड़ने वाला। लेकिन गन्ना, दलहन और तिलहन उत्पादन में अगर कमी आती है; गन्ना उत्पादन घटने की बात तो खुद कृषि मंत्री कह रहे हैं, तो इसका अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ता है। दशकों से हमारे यहां दलहन उत्पादन स्थिर है, और जीवन स्तर ऊपर उठने के साथ दाल और खाद्य तेलों की मांग भी बढ़ी है, जिस कारण साधारण स्थिति में भी इनका आयात करना पड़ता है। चूंकि विश्व बाजार की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं, ऐसे में महंगा आयात महंगाई से हमें शायद ही निजात दिलाए।
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