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खेल तो बराबरी का हो

नई दिल्ली

Updated Thu, 01 Nov 2012 09:04 PM IST
Editorial 1 November
आपसी रिश्ता बेहतर बनाने की दिशा में भारत और पाकिस्तान में कौन ज्यादा प्रतिबद्ध है, यह इन दोनों के दो हालिया कदमों से पता चलता है। एक तरफ भारत ने चार साल बाद पाकिस्तान के साथ क्रिकेट रिश्ता बहाल करने की शुरुआत कर दी है; जिसके तहत देश में पांच क्रिकेट मैच खेले जाएंगे।
दूसरी ओर, पाकिस्तान में लाहौर के शादमान चौक का नाम बदलकर भगत सिंह चौक करने की तैयारी आतंकी संगठनों की धमकियों के बाद रोक दी गई है! यह ठीक वैसा ही मामला है, जैसे वर्षों इंतजार के बाद पाकिस्तान ने भारत को सर्वाधिक वरीयता प्राप्त देश का दरजा देने की घोषणा तो की, लेकिन इसे मूर्त रूप देने से पहले वह भारत पर कई शर्तें आयद करना चाहता है।

जहां तक शादमान चौक की बात है, तो आजादी से पहले तक उसे भगत सिंह चौक कहा ही जाता था; वहीं पहले सेंट्रल जेल थी, जहां भगत सिंह को फांसी दी गई थी। वस्तुतः भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ता सुधारने के लिए भगत सिंह से बड़ा प्रतीक और कोई हो ही नहीं सकता, जो पंजाब के लायलपुर में पैदा हुए, जिन्होंने लाहौर में अपने बचपन और जवानी के कई साल गुजारे तथा ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ते हुए वहीं अंतिम सांस ली।

लेकिन इसलामी पहचान में साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वालों के लिए कोई जगह नहीं है, चाहे वह भगत सिंह जैसी शख्सियत ही क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में शहीद-ए-आजम के अनुयायी नहीं हैं। उन्हीं की मांग पर शादमान चौक का नाम बदलने का फैसला लिया गया था। लेकिन कट्टरपंथियों के दबाव में जिस तरह यह फैसला टाला गया है, उससे फिर साफ होता है कि वहां प्रशासन और सरकार किसके इशारे पर चलती है।

लेकिन दोतरफा रिश्ता सुधारने के लिए वही इसलामाबाद भारत के साथ क्रिकेट संबंध बनाने की बार-बार मांग करता है, क्योंकि इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और उसके क्रिकेट बोर्ड की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है। बेशक खेल को राजनीति से न जोड़ना ही अच्छा है, क्रिकेट से दोनों ओर के आम आदमी जुड़ते हैं। लेकिन पाकिस्तान को यह याद दिलाना चाहिए कि भारत के प्रति किसी मामले में उसने अब तक सदाशयता नहीं दिखाई है, चाहे वह मुंबई हमले से जुड़े आतंकवादियों के खिलाफ जांच का मुद्दा ही क्यों न हो।
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