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जयराम की जेल

नई दिल्ली

Updated Tue, 23 Oct 2012 12:36 AM IST
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ऐसे सुझाव सुनने में बहुत क्रांतिकारी लगते हैं कि खुले में शौच करने वालों को गिरफ्तार कर लेना चाहिए या उन घरों में बेटियां नहीं देनी चाहिए, जिनके घरों में शौचालय न हों। लेकिन इसकी व्यावहारिकता से ग्रामीण विकास, पेयजल और स्वच्छता मंत्री जयराम रमेश खुद भी वाकिफ होंगे। यह त्रासदी ही है कि स्वतंत्रता मिलने के पैंसठ वर्षों के बाद भी देश के 60 करोड़ से अधिक लोगों को अपने दिन की शुरुआत इसी मानवीय यातना के साथ करनी पड़ती है। इस पर कोई गर्व नहीं करना चाहेगा कि खुले में शौच करने को मजबूर दुनिया के 60 फीसदी लोग भारत में बसते हैं।
हैरत की बात यह है कि दुनिया में इस मामले में दूसरे क्रम में इंडोनेशिया है और वहां सिर्फ 62 लाख लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। ये तथ्य यह बताने के लिए काफी हैं कि हमने शौचालय की व्यवस्था को जितनी प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, नहीं दी। अभी पिछले हफ्ते ही सिक्किम ऐसा पहला राज्य बना है, जहां अब कोई खुले में शौच नहीं जाता। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी यह कितनी लंबी लड़ाई है। ऐसा लगता है कि हमने सामाजिक न्याय और समता की बातें तो खूब कीं, लेकिन जिंदगी की बुनियादी जरूरतों को उनसे बिलकुल अलग रखा।

देश के करोड़ों लोगों के पास शौचालय की सुविधा न हो, तो इससे बड़ा सामाजिक अन्याय या इससे बड़ी विषमता और क्या हो सकती है! आखिर राजनीतिक दलों के एजेंडे पर देश के हर नागरिक के लिए पक्के शौचालय की व्यवस्था और स्वच्छता के मुद्दे शामिल क्यों नहीं होते? ऐसा नहीं कि सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को इस मजबूरी से दो चार होना पड़ता है, शहरों में रहने वाली एक बड़ी आबादी, खासतौर से झुग्गी बस्तियों में रहने वालों को भी, न तो शौचालय की सुविधा मिलती है, न पेयजल की। महिलाओं पर क्या गुजरती होगी, इसकी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।

बेशक अशिक्षा को एक कारण माना जा सकता है, लेकिन व्यापक तौर पर इसके पीछे गरीबी-बेरोजगारी और सरकारी तंत्र की नाकामी भी जिम्मेदार है। निर्मल भारत अभियान से जरूर उम्मीद बनी है, मगर अगले दस वर्ष में इस समस्या से निजात पाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसके लिए जरूरी यह भी है कि लोगों को शौचालय ही नहीं, दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी मिल सकें।
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