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अविश्वास प्रस्ताव पर अगर-मगर

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Mon, 19 Nov 2012 10:21 PM IST
Dilemma on no confidence motion
मौजूदा राजनीतिक माहौल में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का पारित होना मुश्किल है। ममता बनर्जी ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर आगामी संसद सत्र में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का संकेत देकर साफ कर दिया है कि वह और उनकी तृणमूल कांग्रेस हाल के महीनों में यूपीए से इतनी दूर छिटक चुकी हैं कि अब दोनों के बीच मेल-मिलाप की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
आगामी दो-तीन दिन में यह भी साफ हो जाएगा कि ममता की पार्टी के प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए भाजपानीत एनडीए कितना जोश-खरोश दिखाता है और यूपीए को बाहर से समर्थन दे रही बसपा व सपा का क्या रुख रहता है। प्रमुख वाम दल माकपा ने पहले ही कह दिया है कि ममता बसपा और सपा का समर्थन जुटा लें, तो वह भी अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने पर विचार कर सकती है।

साफ है कि अनेक मुद्दों पर यूपीए सरकार का विरोध कर रही विपक्षी पार्टियां तथा उसे बाहर से समर्थन दे रही दूसरी पार्टियां भी अविश्वास प्रस्ताव को लेकर एकमत नहीं हैं। वे संसद के बाहर तो मुद्दों की बात करती हैं और सरकार को घेरने के तमाम उपक्रम करती हैं, लेकिन संसद के भीतर राजनीतिक लाभ-हानि का लेखा-जोखा कर के फैसला करती हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो यूपीए सरकार जाने कब सत्ता से बेदखल हो चुकी होती।  

आज भी खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर जो पार्टियां सरकार के विरोध में खड़ी नजर आती हैं, वे यदि इस मुद्दे पर लोकसभा में भी अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने को तैयार होती हैं, तो सरकार का अल्पमत में आना तय है, मगर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा होने की संभावना बहुत कम है। फिलहाल आसार यही हैं कि सपा-बसपा सरीखी पार्टियां एक बार फिर सरकार को बचाने के लिए हाथ बढ़ाएं और उसके लिए अपने कमजोर और लिजलिजे तर्क भी गढ़ें।

माकपा जैसी पार्टियों की दुविधा यह भी है कि खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर अविश्वास प्रस्ताव गिर गया, तब सरकार को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि उसके तमाम फैसलों को संसद की सहमति हासिल है। यह संसदीय लोकतंत्र की विडंबना है कि सरकार अपनी ऐसी नीतियों को भी देश पर थोप सकती है, जिनका संसद के बहुसंख्य सदस्य संसद के बाहर तो मुखर विरोध करते हों, मगर संसद के भीतर उनका विरोध भोथरा हो जाता हो।
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