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आदर्श योजना की मुश्किल डगर

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 26 Nov 2012 10:44 AM IST
difficult way of ideal plan
कल तक महंगाई और भ्रष्टाचार के कारण घिरी मनमोहन सिंह सरकार अब जिस तेजी से फैसले ले रही है, उनसे चुनाव से पहले छवि सुधारने की उसकी कोशिशों का ही पता चलता है। मुंबई हमले की चौथी बरसी से पहले कसाब को आनन-फानन में फांसी देने के बाद अब उसकी निगाह आम आदमी की नब्ज पर है। सबसिडी के सिलेंडर बढ़ाने और सबसिडी के पैसे को सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में डाल देने की कवायदों को इसी आलोक में देखा जा रहा है।
हालांकि सीधे कैश ट्रांसफर योजना के फायदे से इनकार नहीं किया जा सकता। आंकड़े बताते हैं कि पचास फीसदी से अधिक गरीबों को राशन का अनाज नहीं मिलता, बिचौलियों के कारण लगभग 40 प्रतिशत गरीब राशन के केरोसीन से वंचित रह जाते हैं। मनरेगा जैसी योजनाएं भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं। एक ऐसा भ्रष्ट तंत्र बन चुका है, जो कभी नियमों का हवाला देकर, तो कभी पूरे दस्तावेज न होने का तर्क देकर गरीबों को उनके हक से वंचित करता है, और उनके लाभ खुद उठा लेता है।

सबसिडी सीधे जरूरतमंदों को दी जाएगी, तो इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, सबसिडी का बोझ घटेगा और सरकारी योजनाओं का लाभ दिखेगा। लेकिन कागज पर यह योजना जितनी आदर्श है, उसका अनुपालन उतना आसान नहीं है। इसकी एक वजह तो यही है कि यह योजना पूरी तरह 'आधार' पर आधारित है, जबकि सभी लोगों के पास आधार संख्या अब भी नहीं है। ऐसे में अगले साल तक ऐसा शायद ही संभव हो। सवाल केवल आधार संख्या का ही नहीं है, सभी जरूरतमंदों को बैंकिंग तंत्र के दायरे में ले आना और उनके डाटा यूआईडी से जोड़ना न तो आसान है, और न ही इतनी जल्दी संभव हो सकता है।

कैश सबसिडी के आलोचक मानते हैं कि यह गरीबों को बाजार के भरोसे छोड़ देने की साजिश है; यह भी संभव है कि दूसरी जरूरत आ पड़ने पर गरीब सबसिडी के पैसे को वहां लगाएं और महंगा अनाज न खरीद पाएं। लेकिन जब लोगों के पास पैसे आएंगे, तो उनका जीवन स्तर ऊपर उठेगा। अलबत्ता इसके लिए जरूरी है कि सरकार इस महत्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन पर पैनी नजर रखे और जरूरतमंदों को लाभ मिले, यह सुनिश्चित भी करे।
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