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इस आर्थिक सुधार की कीमत

Ashok Kumar

Ashok Kumar

Updated Mon, 01 Oct 2012 11:52 AM IST
cost of this economic reform
एक ओर प्रधानमंत्री आर्थिक सुधारों को जारी रखने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ महंगाई की एक और किस्त सामने है। आज से रेलवे की वातानुकूलित श्रेणियों में सफर थोड़ा और महंगा हो जाएगा। पिछले रेल बजट में वातानुकूलित श्रेणी के किराये बढ़े थे, ऐसे में 3.708 फीसदी अतिरिक्त सेवा कर का बोझ कचोटने वाला तो है ही। इसी तरह रेलवे से सीमेंट, लोहे और कोयले की ढुलाई भी अब दो फीसदी महंगी हो जाएगी। बेशक सरकार ने खाद्यान्न और दूसरी जरूरी चीजों की ढुलाई को इस बोझ से अलग रखा है, पर सीमेंट, लोहा और कोयला महंगा होगा, तो अर्थव्यवस्था पर उसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। निर्माण क्षेत्र पर प्रभाव पड़ने के अलावा इससे औद्योगिक उत्पादन भी महंगा होगा।
मुद्रास्फीति पहले से ही दोहरे अंक पर है, डीजल के दाम बढ़ने के बाद इसमें और तेजी स्वाभाविक ही है। इस बीच वित्तीय सुदृढ़ीकरण पर केलकर कमेटी की जो रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है, उसमें तमाम सबसिडियों को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की सिफारिश की गई है। अलोकप्रिय होने के डर से सरकार ने इन सिफारिशों को लागू करने में फिलहाल भले ही अनिच्छा जताई हो, लेकिन आर्थिक सुधारों का जो एजेंडा सरकार ने तैयार किया है, उसमें रसोई गैस, डीजल और केरोसीन से सबसिडी पूरी तरह हटाने का इरादा है। इसके दो नतीजे होंगे।

एक तो इससे कल्याणकारी राज्य की वह व्यवस्था ही पूरी तरह खत्म हो जाएगी, जिस पर आजादी के बाद से हमारी सरकारें कमोबेश चलती रही हैं। प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्रियों ने इशारा भी किया है कि यूपीए की आर्थिक नीति अब जिस दिशा में जा रही है, वह दो दशक पहले की नीतियों से भी घातक है, क्योंकि करीब सवा अरब की आबादी वाले देश के गरीबों और निम्न मध्यवर्ग को इसमें बाजार के हवाले छोड़ देने की संवेदनहीनता दिखती है।

फिर सबसिडी खत्म करने का तात्कालिक नुकसान यह होगा कि मुद्रास्फीति की दर लगातार ऊंची बनी रहेगी। हमारी आर्थिक सेहत वैसे भी अच्छी नहीं, विकास दर नीचे जा रही है। ऐसे में बढ़ती महंगाई और ऊंची ब्याज दरों के कारण खेती से लेकर उद्योग तक किसी को कोई राहत नहीं मिलने वाली। लगभग जिद पर उतरी सरकार से पूछना ही चाहिए कि ये कथित आर्थिक सुधार आखिर किसके लिए हैं। 
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