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जनहित की सीमा रेखा

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Fri, 28 Sep 2012 08:46 PM IST
प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन पर निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश एस एच कपाड़िया की अगुआई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ की व्याख्या नीतिगत निर्णयों के मामले में मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस साल फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय की ही एक पीठ ने 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन से संबंधित सभी 122 लाइसेंसों को रद्द कर इनकी खुली नीलामी करने के निर्देश दिए थे, जिससे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी।
इस पर राष्ट्रपति द्वारा आठ बिंदुओं में मांगी गई राय के जवाब में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन का एकमात्र सांविधानिक तरीका नीलामी ही नहीं है, और ऐसा कोई भी कदम सरकार के नीतिगत निर्णयों से जुड़ा होता है। इस तरह देखा जाए, तो सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यपालिका और अपने बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचते हुए स्पष्ट किया है कि जनहित में संसाधनों के आवंटन का तरीका तय करना सरकार का विशेषाधिकार है।

इसलिए उसका यह कदम कैग जैसी दूसरी सांविधानिक संस्थाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है, क्योंकि हाल ही में कोयला खदानों के आवंटन पर आई उसकी रिपोर्ट में की गई टिप्पणियों से ऐसा आभास होने लगा था कि वह सरकार के कामकाज में दखल दे रही है। इसीलिए इस फैसले को सिर्फ 2 जी स्पेक्ट्रम या कोयला घोटाले के आलोक में ही नहीं देखना चाहिए।

बेशक, इससे चौतरफा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार राहत महसूस कर रही होगी, लेकिन संविधान पीठ की यह व्याख्या सरकार के लिए कोई क्लीन चिट नहीं है। उसने संशय के कुछ बिंदुओं की सिर्फ व्याख्या की है, सरकार के पक्ष में कोई निर्णय नहीं दिया है, जैसा कि जताने की कोशिश हो रही है।

वस्तुतः सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित को ही सर्वोपरि रखा है और कहा है कि यदि कीमती प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन से संबंधित किसी नीतिगत निर्णय के पीछे जनहित का मकसद न होकर सिर्फ निजी क्षेत्र को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पहुंचाना ही उद्देश्य हो और यदि ऐसे किसी कदम से अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार का हनन होता है, तब अदालत इसमें दखल दे सकती है। बेशक, सरकार इस राय को मानने को बाध्य नहीं है, लेकिन इसने एक बड़ी दुविधा दूर कर दी है।


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