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और बदल जाएंगे हमारे बैंक

Vikrant Chaturvedi

Vikrant Chaturvedi

Updated Wed, 19 Dec 2012 11:23 PM IST
and will change our bank
बैंकिंग अधिनियम संशोधन विधेयक का राज्यसभा से पारित होना भले अभी शेष हो, पर इसके महत्व के बारे में कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। हकीकत यह है कि एफडीआई लागू करने के बाद आर्थिक सुधारों की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण विधेयक है। दरअसल उदारवादी अर्थनीति लागू करने के बावजूद बैंकिंग क्षेत्र का कामकाज बैंकिंग रेग्यूलेशन ऐक्ट, 1949 के जरिये ही हो रहा था।
दुनिया के शीर्ष 20 बैंकों की सूची में भारतीय बैंक भले ही शामिल न हों, लेकिन रिजर्व बैंक के कठोर दिशा-निर्देश और पारदर्शिता की नीति ने यहां के बैंकों को इतना पेशेवर और मजबूत तो बनाया ही कि मंदी के दुर्दिनों में भी उनका हश्र अमेरिकी बैंकों जैसा नहीं हुआ। अलबत्ता उदार अर्थनीति लागू करने के बाद भी कुछ बड़े निजी बैंकों के आगमन को छोड़कर अब तक ज्यादा कुछ नहीं दिखा था, तो इसके पीछे बैंकों के मजबूत वामपंथी यूनियनों के कमोबेश दबाव का भी हाथ था।

इसी वजह से यह तर्क दिया जा रहा था कि उदारीकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र में रोजगार सबसे कम रह जाएगा। लेकिन अनुभव बताते हैं कि बड़े निजी बैंकों के आगमन ने हमारे बैंकिंग परिदृश्य को बेहतर ढंग से बदला है। नौकरियां कम होने की तो बात छोड़ें, बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच बैंकों का कामकाज सुधरा है, जिसका सर्वाधिक लाभ उपभोक्ताओं को मिला है। नए कानून में सार्वजनिक और निजी बैंकों के निवेशकों के वोटिंग अधिकार बढ़ेंगे, तो इन बैंकों को अधिक विदेशी निवेश मिलेगा, जिससे उनका आर्थिक आधार और मजबूत होगा।

कॉरपोरेट क्षेत्र के दिग्गज बैंकिंग के क्षेत्र में आएंगे, तो उपभोक्ताओं को और ज्यादा विकल्प मिलेगा। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बढ़े हुए विकल्पों के बीच उपभोक्ताओं के लाभान्वित होने का उदाहरण हमने दूरसंचार के क्षेत्र में देखा ही है। नया कानून बनने के बाद रिजर्व बैंक जहां बैंकों पर नियंत्रण रखने का अपना पुराना काम जारी रखेगा, वहीं प्रतिस्पर्धा आयोग बैंकों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर नजर रखेगा। बैंकों को वायदा कारोबार में हिस्सेदारी की इजाजत देने वाले प्रावधान को हटाकर रही-सही आशंका भी दूर कर दी गई है। उम्मीद करनी चाहिए कि नए कानून से भारतीय बैंक बेहतरी की दिशा में और तेज गति से बढ़ेंगे।

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