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श्रीमल्लिकार्जुन

राकेश

Updated Mon, 16 Jul 2012 12:00 PM IST
sri mallikarjun jyoterlinga
यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। इस पर्वत को दक्षिण का कैलास कहा जाता है। महाभारत, शिव पुराण तथा पद्मपुराण में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। पुराणों में इस ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार बतायी गयी है। एक बार की बात है, भगवान शंकर जी के दोनों पुत्र श्रीगणेश और श्रीस्वामी कार्तिकेय विवाह के लिए परस्पर झगड़ने लगे। प्रत्येक का आग्रह था कि पहले मेरा विवाह किया जाय।
उन्हें झगड़ते देखकर भगवान शंकर और मां भवानी ने कहा कि तुम लोगों में से जो पहले पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर यहां वापस लौट आएगा उसी का विवाह पहले किया जाएगा। माता-पिता की यह बात सुनकर श्री स्वामी कार्तिकेय तो तत्काल पृथ्वी प्रदक्षिणा के लिए दौड़ पड़े। लेकिन श्रीगणेश जी के लिए तो यह कार्य बड़ा कठिन था। एक तो उनकी काया स्थूल थी, दूसरे उनका वाहन भी मूषक (चूहा) था। भला वह दौड़ में स्वामी कार्तिकेय की समता कैसे कर पाते। उनकी काया जितनी स्थूल थी, बुद्धि उसी के अनुपात में सूक्ष्म और तीक्ष्ण थी।



उन्होंने अविलंब पृथ्वी की परिक्रमा का एक सुगम उपाय खोज निकाला। सामने बैठे माता-पिता का पूजन करने के पश्चात उनकी सात प्रदक्षिणाएं करके उन्होंने पृथ्वी प्रदक्षिणा का कार्य पूरा कर लिया। उनका यह कार्य शास्त्रानुमोदित था। पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर स्वामी कार्तिकेय जब तक लौटे तब तक गणेश जी का सिद्धि और बुद्धि नामक दो कन्याओं के साथ विवाह हो चुका था और उन्हें क्षेम तथा लाभ नामक दो पुत्र प्राप्त हो चुके थे। यह सब देखकर कार्तिकेय अत्यंत रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत पर चले गये। माता पार्वती वहां उन्हें मनाने पहुंची। पीछे शंकर भगवान वहां पहुंचकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। तभी से मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रख्यात हुए। सर्वप्रथम इसकी अर्चना मल्लिका पुष्पों से की गयी थी। मल्लिकार्जुन नाम पड़ने का यही कारण है।



एक दूसरी कथा भी कही जाती है कि इस शैलपर्वत के निकट किसी समय राजा चंद्रगुप्त की राजधानी थी। किसी विपत्ति के निवारणार्थ उनकी एक कन्या महल से निकलकर इस पर्वतराज के आश्रय में आकर यहां के गोपों के साथ रहने लगी। उस कन्या के पास एक बड़ी ही शुभलक्षणा सुंदर श्यामा गौ थी। उस गौ का दूध रात में कोई चोरी से दुह ले जाता था। एक दिन संयोगवश उस राजकन्या ने चोर को दूध दुहते देख लिया। क्रुद्ध होकर चोर की ओर दौड़ी, किंतु गौ के पास देखा कि शिवलिंग के अलावा कुछ भी नहीं। राजकुमारी ने कुछ काल पश्चात एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया। बाद में यह शिवलिंग मल्लिकार्जुन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस शिवलिंग के दर्शन से दैहिक, दैविक, भौतिक सभी प्रकार की बाधाएं दूर हो जाती हैं।
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