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शरद पूर्णिमा विशेषः विलुप्त हो रही है श्रीकृष्ण की अद्भुत कला

हिमांशु त्रिपाठी/मथुरा

Updated Mon, 29 Oct 2012 10:58 AM IST
wonderful art ras lila being extinct
श्रीकृष्ण की अद्भुत कला महारास अब लुप्त होती जा रही है। आज सिर्फ चंद लोग इसे बचाने का जतन कर रहे हैं। सरकारी उपेक्षा के चलते आज इसका प्रचार-प्रसार भी नहीं हो पा रहा है।
आज शरद पूर्णिमा है। इसी रात परासौली के पौराणिक चंद्रसरोवर पर भगवान श्रीकृष्ण ने बांसुरी की ऐसी तान छेड़ी थी कि सुधबुध खोकर गोपियां चंद्रसरोवर जा पहुंची थीं। प्रभु ने उन्हें समझाया कि वह घर जाएं पर गोपियां नहीं मानीं। इसके बाद गोपियों संग प्रभु ने महारास रचाया।

मान्यता है कि दृश्य ऐसा था कि हर गोपी संग प्रभु रास रचा रहे थे और चंद्र भगवान उस अलौकिक छवि को देखने जमीं पर उतर आए थे। चंद्र सरोवर का उदय भी उसी समय हुआ था। आज भगवान श्रीकृष्ण को हृदय में बसाकर चंद कलाकार महारास करते हैं।

महारास के उत्थान में लगे उत्तर प्रदेश संगीत नाट्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष मोहन स्वरूप भाटिया कहते हैं, यह कठिन है। रास में तो एक श्रीकृष्ण और कुछ गोपिओं से कला मंच पर उतर आती है, लेकिन महारास में जितने कृष्ण उतनी ही गोपियां ऐसा सजीव नृत्य करती हैं कि आंखें बोलती हैं। बड़ी टोली से ही यह संभव है, जो मुश्किल है। ब्रज में कई ग्रुप संग मिलकर एक महारास का आयोजन करते हैं लेकिन कई ग्रुप का संग मिलजुलकर काम कर पाना इतना आसान नहीं होता है।

महारास को मंच प्रदान करने के लिए वृंदावन के स्वामी रामस्वरूप जी लंबे समय से कार्य कर रहे हैं। स्वामी गुरुशरणानंद जी महाराज की प्रेरणा से मथुरा से कुछ दूरी पर रमणरेती में कुछ दिन पूर्व जब महारास हुआ तो इसके आध्यात्म का संदेश दूर तलक गया। इस कला को निरंतर ऐसे मंच की जरूरत है, जिससे महारास का महासंदेश सारी दुनिया के लोगों के दिलों में बस जाए।
 
महारास को जीती हैं वंदना
मथुरा में राधापुरम स्टेट निवासी वंदना सिंह जब मंच पर महारास करती हैं तो उनकी आंखें जाहिर करती हैं कि इस कला को वह किस तरह जी रही हैं। महारास को वह विभिन्न शहरों से होते हुए महाराष्ट्र तक ले गईं। 18 नवंबर को मुंबई में वह फिर महारास को मंच पर उतारेंगी। वर्तमान हालात से दुखी कलाकार वंदना कहती हैं कि सरकारी सहयोग ठीक से मिले तो कान्हा की यह अद्भुत कला कलियुग में भी लोगों के दिलों में बस जाएगी।
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