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जयंती: सरदार पटेल के बिना अधूरी थी विशाल भारत की कल्पना

इंटरनेट डेस्‍क/धर्मेंद्र आर्य

Updated Wed, 31 Oct 2012 10:45 AM IST
without sardar patel vision of india was incomplete
दुनिया के नक्‍शे पर भारत को एक ताकतवर मुल्क का दर्जा दिलाने वाले लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल इतिहास के अमिट अध्याय हैं। आजादी के बाद रियासतों में बंटे देश को पटेल ने एक राष्ट्र बनाने का बीड़ा उठाया। जिस विशाल भारत का आज पूरी ‌दुनिया लौहा मानती है, उसकी कल्पना बिना पटेल के शायद पूरी नहीं हो पाती। 1947 में भारत की आजादी के बाद पहले तीन वर्ष वह उप प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, सूचना मंत्री और राज्य मंत्री रहे। उन्हें मरणोपरांत 1991 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया।
आलोचनाओं से कभी नहीं डरे
गुजरात के नाडियाड़ में 31 अक्टूबर 1875 को जन्मे सरदार बल्लभ भाई पटेल का पूरा जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित था। उनके बारे में कहा जाता है कि वे देश के लिए सोचते समय अपनी आलोचना की भी परवाह नहीं करते थे। पटेल के मन पर शुरुआत से ही गांधीजी के विचारों का बहुत गहरा प्रभाव था। अंग्रेज सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ पटेल ने नागरिक अवज्ञा आंदोलन के जरिए खेड़ा बोरसाद और बारदोली के किसानों को एकत्र किया। अपने देश-भक्ति के कार्यों के कारण पटेल जल्द ही गुजरात के लोकप्रिय नेता बन गए। आजादी के आंदोलनों में वे कई बार जेल भी गए।

महान योगदान के लिए मिली लौहपुरुष की उपाधि
15 अगस्त 1947 को जब भारत गुलामी की जंजीरों से आजाद हुआ तो सरदार पटेल के ऊपर 565 रियासतों और ब्रिटिश काल के दौरान उपनिवेशीय प्रांतों को भारत में मिलाने की जिम्मेदारी आ गई। पटेल ने अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक कुशलता से इस कर्तव्य को बखूबी निभाया और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग से भी नहीं चूके। बिना किसी का खून बहाये उन्होंने रियासतों का एकीकरण किया, केवल हैदराबाद के लिए उनको सेना भेजनी पड़ी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिए, उन्हें भारत का लौह पुरूष कहा गया।

...तो सुलझ जाती कश्मीर समस्या
पटेल के प्रयासों के चलते सिर्फ तीन रियासतों को छोड़कर बाकी सभी ने अपनी इच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद के राजाओं ने अपनी रियासतों का भारत में विलय करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। इनमें जूनागढ़ के नवाब का जब बहुत विरोध हुआ, तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ़ का भारत में विलय हो गया। इसके बाद जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है। ऐसा माना जाता है कि अगर सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती, जैसा कि उन्होंने स्वयं भी अनुभव किया था, तो हैदराबाद की तरह यह समस्या भी आसानी से सुलझ जाती। 15 दिसंबर, 1950 को मुंबई में इस महान देशभक्त का निधन हो गया।
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