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ओबामा की जीत से भारत को क्या होगा फायदा?

राम शंकर

Updated Wed, 07 Nov 2012 01:10 PM IST
what benifit india will get from obama victory
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा की जीत का जश्न भारतीय मीडिया भी मना रहा है। राष्ट्रपति पद पर ओबामा की दोबारा ताजपोशी के कई मायने हैं। खासकर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो अभी से ही अमेरिकी नीति को लेकर चर्चाएं गरम हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत का भला इस बात से जुड़ा है कि यहां का राजनीतिक नेतृत्व किस तरीके से अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा फायदा ले सकता है। वैसे अमेरिका की नीति यही रही है कि दुनिया से पैसे इकट्ठा करो और उन संसाधनों का प्रयोग अमेरिकी आर्थिक और सैन्य हितों के लिए करो।

कैसा रहा है राजनीतिक इतिहास
अभी तक का अमेरिकी राजनीतिक इतिहास रहा है कि जब डेमोक्रेट्स जीतते हैं तो उनका भारत के प्रति लचीला व्यवहार रहता है वहीं रिपब्लिकन पार्टी का रवैया कभी नरम तो कभी गरम वाला रहा है। शुरुआती दौर की बात करें तो हैनरी टुमैन (डेमोक्रेटिक), आइजनहॉवर (रिपब्लिकन), जॉन एफ कैनडी (डेमोक्रेटिक), रिचर्ड निक्सन (रिपब्लिकन) और बुश सीनियर (रिपब्लिकन) तक भारत के प्रति अमेरिकी रवैया नकारात्मक रहा।

एटमी करार से रिश्ते को मिली मजबूती
पंडित जवाहर लाल नेहरू के गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अमेरिका ने एक ‌प्रतिद्वंद्वी गुट के तौर पर माना था। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी रवैया भारत के लिए कभी भी सहज नहीं रहा। कहा जाता है कि 2000 में जॉर्ज डब्‍ल्यू बुश को यह भी नहीं पता था कि भारत का प्रधानमंत्री कौन है और पाकिस्तान का राष्ट्रपति कौन। हालांकि परमाणु करार जॉर्ज डब्‍ल्यू बुश के कार्यकाल में हुआ और भारत-अमेरिका ने संबंध की नई इबारत लिखी। बाद में बराक ओबामा ने इसी नीति को बनाए रखा।

आउटसोर्सिंग और आईटी पर नजर
पहले कार्यकाल में ओबामा ने आईटी इंडस्ट्री और आउटसोर्सिंग को लेकर कई सख्त कदम उठाए थे। आउटसोर्सिंग के नियम कड़े कर दिए गए और वीजा फीस भी तीन गुनी महंगी हो गई। ओबामा और रोमनी दोनों ने माना था कि विदेशी छात्रों को अधिक तादाद में बुलाना और स्कॉलरशिप देना अमेरिका की जरूरत है।

हालांकि आर्थिक हालातों के चलते विदेशी छात्रों को मिलने वाली स्कॉलरशिप में कमी आई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में अमेरिका में आर्थिक हालात कमजोर रहने वाले हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों को अमेरिका में जगह बनाने का मौका मिल सकता है।

चीन, पाक की तुलना में भारत को वरीयता
पिछले कई सालों में पाकिस्तान और चीन को लेकर अमेरिकी नीति में बदलाव हुआ है। चीन की आर्थिक और सैन्य शक्ति को लेकर अमेरिका शुरू से ही चिंतित रहा है। वहीं आतंकवाद पर पाकिस्तान के दोहरे रूख को लेकर अमेरिका में विरोधी स्वर उठने लगे हैं।

दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावे से ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, फिलीपींस और भारत उससे खार खाए बैठे हैं। अमेरिका के पास चीन विरोधी गठजोड़ खड़ा करने का एक अच्छा मौका माना जा रहा है। अमेरिका की मजबूरी है कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ जंग में उसे पाकिस्तान का साथ चाहिए। ऐसे में पाकिस्तान को मदद देने के बावजूद सामरिक और आर्थिक सहयोगी के तौर पर उसने भारत को प्राथमिकता दिया है।
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