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गुजरात का एक ही सवाल, मोदी नहीं तो कौन?

इन्दुशेखर पंचोली/नई दिल्‍ली

Updated Mon, 05 Nov 2012 10:21 AM IST
single question looms in gujarat who will replace narendra modi
रंग बदलते मौसम की तरह सियासी रौनक पर भले गुलाबी सर्दी छाई हो, नरेंद्र मोदी गुजरातियों के बड़े तबके के लिए ऐसा नाम बन चुका है जो उनमें अचानक गर्मजोशी बढ़ा देता है।
चौराहों-सभाओं से लेकर बंद कमरों तक मोदी का महिमामंडन, आम गुजराती की अस्मिता से जुड़ या जोड़ दिया गया है। सियासी खिलाड़ियों, वैचारिक विरोध रखने वाले बुद्धिजीवी और दंगों के शिकार बने परिवारों को छोड़ दें तो मोदी की मुखालफत करने वाले या नाराज लोग तलाशना खासा मशक्कत का काम है। कोई नाराज शख्स मिल भी जाएगा तो निजी तौर पर मोदी के खिलाफ टिप्पणी करेगा ही, यह दावा नहीं किया जा सकता।

ऐसे में चुनाव में क्या होगा, मोदी हैट्रिक लगा पाएंगे-जैसे सवाल कम से कम शहरी इलाकों में तो बेमानी-से लगते हैं। कुछ ग्रामीण-आदिवासी इलाकों में जरूर ऐसी अनुकूलता नहीं है, सियासत के जानकार ऐसा बताते हैं, लेकिन पूरे सियासी माहौल पर मोदी की शख्सियत जिस तरह हावी है, उससे उनकी राह में बड़ी बाधा तो नजर नहीं ही आती।

'मीडिया ने मोदी को बदनामी से ज्यादा ख्याति दी'

टिप्पणीकार विद्युत ठाकर कहते हैं, पिछले एक दशक में गुजरात के सभी सामाजिक-सियासी मुद्दे मोदी-केंद्रित हो गए हैं। यहां आपको दो ही पक्ष मिलेंगे, मोदी समर्थक और मोदी विरोधी। राजनीतिक पार्टियां भी मायने खो चुकी हैं। कहने को 2007 में चालीस पार्टियों ने चुनाव लड़ा था, दो-तीन इस दफा और बढ़ जाएंगी। लेकिन, सभी के ऊपर छतरियां दो ही हैं। ठाकर का कहना है, मीडिया ने मोदी को बदनामी तो दी, लेकिन उससे ज्यादा ख्याति दी है। प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर कद इतना बढ़ा दिया कि गुजरात के सभी नेता बौने दिखने लगे हैं।

अपना लक्ष्य, अपना एजेंडा

वहीं, गुजरात विद्यापीठ से जुड़े समाजशास्त्री और स्तंभकार विद्युत जोशी का आकलन है कि मोदी मानव-मस्तिष्क के पैने अध्येता हैं, उन्होंने गुजरातियों की कारोबारी वृत्ति और लाभ के गणित को बेहतर तरीके से समझा है, इसीलिए तमाम विपरीत हालात में भी वे विपक्षियों पर बढ़त बनाते और जीतते नजर आ रहे हैं। मोदी-विरोधी होने की पहचान रखने वाले जोशी का कहना है कि अब मोदी संघ के प्रचारक नहीं हैं, न उसके एजेंडे पर काम कर रहे हैं। उनका अपना लक्ष्य है, अपना एजेंडा है। इंदिरा गांधी जैसे निरंकुश मोदी ने गुजरात में संघ को उसी तरह खत्म किया, जैसे इंदिरा ने सेवादल को किया था।

मुद्दे वही जो मोदी को भाएं
मोदी पिछले चुनाव में हिन्दुत्व की सवारी कर रहे थे, इस बार वे विकास-पुरुष की पगड़ी पहने हैं। विकास का अपना मॉडल वे लोगों को समझाने में कामयाब भी रहे हैं। महज 1200 की आबादी वाले गांव शीयावाड़ा का यामा पटेल इसका प्रतीक है। सियासी जानकारों के मुताबिक, उनकी फितरत है, वे अपनी जंग लड़ते हैं, मैदान भी खुद तय करते हैं और दुश्मन को वहीं खींच लाते हैं। हिन्दुत्व अब उनका मुद्दा नहीं है, वह उनके नाम का पर्याय है। गुजरात का विकास उनका इस बार का मुद्दा है, वे काफी हद तक कांग्रेस को इस मुद्दे पर ले आए हैं। सोनिया गांधी ने चुनाव अभियान की शुरुआत में गुजरात के विकास की नींव तो हमने रखी है, कहकर इसके संकेत भी दे दिए। हालांकि मोदी का नाम लिए बिना उन्होंने यह भी कहा, कुछ लोग दूसरों के विकास का श्रेय खुद ले लेते हैं।

अपनों की चुनौती ज्यादा
जानकारों की मानें तो मोदी को रक्षात्मक कांग्रेस ने नहीं, अपनों ने किया है। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल, सुरेश मेहता, आरएसएस के भास्कर राव दामले, प्रवीण मणियार, विश्व हिन्दू परिषद के प्रवीणभाई तोगड़िया, मजदूर संघ के केशुभाई ठक्कर के विरोध ने उन्हें रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। हालांकि विद्युत जोशी जैसे जानकारों का दावा है कि तीसरा पक्ष गुजरात में कभी हैसियत बना ही नहीं पाया। इसका कारण गुजरातियों का कारोबार है। 40 फीसदी गुजराती कारोबारियों का निवेश गुजरात से बाहर है।

हमले को बनाते हथियार
मोदी की एक और खासियत अपने पर हमलों को हथियार में बदलने की है। मौत के सौदागार जैसे आरोपों से कांग्रेस इसीलिए बच रही है। बकौल विद्युत ठाकर, मोदी-विरोधी केशुभाई पटेल, सुरेश मेहता वही गलती दोहरा रहे हैं। आश्चर्य होगा कि मोदी ने केशुभाई के विरोध में आज तक एक शब्द तक नहीं बोला है।

मुसलमान किस तरफ?
2002 के दंगों के एक दशक बाद मुसलमानों के सोच में भी कुछ बदलाव आया है। हाल में, एक टीवी चैनल की रायशुमारी में मोदी को पसंद करने वाले मुसलमानों की तादाद 2007 में 16 फीसदी की तुलना में अब 26 फीसदी पहुंच जाने से भी यह जाहिर होता है। हालांकि अहमदाबाद के जमालपुर इलाके के जेएम शेख का कहना है कि मोदी बड़ा दिल दिखाते हुए दंगों के लिए माफी मांग लें, तो उनकी दिक्कतें कम ही होंगी। विद्युत ठाकर का दावा है, मुसलमान अब समझौते के मूड में हैं, बरेलवी, बोहरा और शिया मसलक में मोदी की स्वीकार्यता बढ़ी है। मोदी भी पहले जितने कट्टर नहीं दिखते। सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की नजदीकी और गुजरात कांग्रेस की पूर्व प्रवक्ता आसिफा खान के हाल में भाजपा में शामिल होने का संदेश भी शायद यही है।

पटेल क्या गुल खिलाएंगे
लेउवा और कड़वा, दो हिस्सों में बंटे पटेल गुजरात की बड़ी जाति है। कारोबार से लेकर राजनीति तक सक्रिय और शक्तिशाली। भाजपा के संस्थापक रहे 84 वर्षीय केशुभाई अपनी जाति के दम पर ही गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) बनाकर चुनावी मैदान में उतरे हैं। लेकिन, राजनीतिक विश्लेषक उन्हें इतना दमदार नहीं मान रहे। पहला कारण, गुजरात में जातिवाद यूपी-बिहार जितना पैठा नहीं है। दूसरा, केशुभाई का असर महज सौराष्ट्र की कुछ सीटों तक सीमित है। तीसरा, औद्योगिक इकाइयों के आने से कड़वा पटेलों को खासा काम मिला है। चौथा, मोदी-राज में कारोबारी लेउवा पटेलों की अहमियत भी बढ़ी है। पांचवां, जीपीपी को कांग्रेस की बी-टीम ही माना जा रहा है। छठा, केशुभाई के दाहिने हाथ सांसद रहे कांशीराम राणा के असमय अवसान ने उन्हें कमजोर किया है।

एंटी इनकम्बेन्सी कितना असर
ग्यारह साल के मोदी-राज में सत्ता-विरोधी बयार से कोई इनकार नहीं करता। लेकिन, गुजरात में यह पश्चिम बंगाल जैसी सुनामी कहीं नहीं दिखती। विश्लेषक विद्युत ठाकर कहते हैं, मोदी के पास हर चुनाव में इसका इलाज रहता है। अब तक वे पंचायतीराज हो या स्थानीय निकाय, कोई चुनाव नहीं हारे। इस बार भी करीब पचास फीसदी विधायकों के टिकट काटकर वे अपना तुरुप चलने वाले हैं। विद्युत जोशी इससे इतर तर्क देते हैं। बकौल जोशी, मोदी राज में भी भ्रष्टाचार है, भ्रष्ट मंत्री भी हैं। लेकिन, कांग्रेस के पास वैसा प्रचार-तंत्र नहीं है। कांग्रेस सिर्फ मोदी को कमजोर करने के लिए लड़ रही है, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की चुनौती कमजोर करने के लिए। खुद जीतने के लिए नहीं।
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