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अपार संभावनाओं का देश है भारत

मार्क टुली (प्रख्यात पत्रकार)

Updated Sun, 26 Jan 2014 09:10 AM IST
republic day future of india
भारत के लिए आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ महीने बाद ही देश को आम चुनाव से गुजरना है। एक नई पार्टी का जन्म हुआ है और वह एक नई तरह की राजनीति कर रही है।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी तक पर्दे के पीछे से राजनीति करते रहे हैं। मगर वह अब नए रूप में बाहर निकल आए हैं और उन्होंने पार्टी की कमान सीधे अपने हाथ में ले ली है।

वहीं नरेंद्र मोदी के उभार के बाद भारतीय जनता पार्टी की नीतियां और कार्यक्रम पीछे रह गए हैं। उनका अभियान कार्यक्रमों और नीतियों से कहीं अधिक खुद उनकी छवि और उनकी क्षमता को लेकर है। ऐसे परिदृश्य में हम 65 वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं।

किसी भी देश के लिए 65 वर्ष की अवधि बहुत अधिक नहीं होती, लेकिन यह उसकी क्षमता और आकांक्षाओं के आकलन के लिए पर्याप्त है। आज जब मैं देखता हूं, तो महसूस होता है कि गवर्नेंस यानी शासन आज भी देश की सबसे बड़ी चुनौती है।

इतने वर्षों बाद भी देश के सुदूर इलाकों तक आजादी की रोशनी नहीं पहुंच सकी है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह गवर्नेंस की कमी ही है। दूसरा कारण आर्थिक निवेश की प्राथमिकता से जुड़ा है, जिस पर गौर करने की जरूरत है।

आधारभूत संरचनाओं के विकास और निवेश को आर्थिक प्रगति का पैमाना मान लिया गया है। दो राय नहीं कि आधारभूत संरचनाएं मजबूत हुई हैं।

मगर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि, जैसा कि हाल ही में रेल मंत्री ने स्वीकार किया कि सिर्फ 25 फीसदी योजनाओं पर ही अमल हो सका है, योजनाओं पर सही तरीके से अमल नहीं होता।

यह सिर्फ एक उदाहरण है। यही बात शिक्षा के बारे में कही जा सकती है, जिसमें देश में अहम काम हुआ है। मसलन, शिक्षा का अधिकार एक अच्छी पहल है, लेकिन हाल ही में आया एक सर्वे प्राथमिक शिक्षा की बदतर स्थिति को बयान करता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही स्थिति है।

शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर के मामले में भारत अपने पड़ोसी देशों से भी बदतर स्थिति में है। यह स्थिति शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश की स्थिति को बयान करती है, जहां निवेश की और जरूरत है।

देश ने जब 26, जनवरी 1950 को संविधान पर अमल किया था, तब विभिन्न संस्थाओं, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका, की भूमिकाएं तय कर दी गई थीं। मगर पिछले कुछ वर्षों में इन संस्थाओं ने या तो एक दूसरे के क्षेत्र में दखल दिया या फिर उन्हें ऐसा करना पड़ा है।

असल में भ्रष्टाचार, अनुशासन की कमी और पूरी क्षमता का उपयोग नहीं करने की वजह से ये संस्थाएं कमजोर हुई हैं। न्यायपालिका कार्यपालिका के काम में दखल दे रही है, तो राजनीतिक वर्ग नौकरशाही के काम में अड़ंगा डालता है। संविधान ने इन संस्थाओं के बीच दीवार खड़ी की थी, जो लगता है टूट गई है।

मगर फिर भी, जब हम 15 अगस्त, 1947 की स्थिति से आज की तुलना करें तो हम आश्वस्त हो सकते हैं। उस समय गरीबी और साक्षरता की जो दर थी, उसकी तुलना में गरीबी के प्रतिशत में कमी आई है और साक्षरता की दर भी काफी ऊंची हुई है।

लेकिन भारत के पास जितनी क्षमता है उसका पूरा उपयोग नहीं हो रहा है, जिस पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।
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