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रिकॉर्ड मतदान मोदी को दे सकता है बड़ी जीत?

समीर शर्मा/अहमदाबाद

Updated Tue, 18 Dec 2012 03:33 PM IST
record voting will be decided modi future in gujarat polls
गुजरात विधानसभा चुनाव में बिना खास चुनावी मुद्दे के सभी सीटों पर औसतन 70 फीसदी से अधिक के रिकॉर्ड मतदान ने बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों और राजनीतिक पार्टियों के आकाओं को अपना माथा खुजाने पर मजबूर कर दिया है। लोगों ने स्वविवेक का इस्तेमाल कर बढ़-चढ़कर मतदान किया और इसे जनता लहर कहा जाए, तो गलत नहीं होगा। भारी मतदान को केवल एंटी इनकम्बैंसी से जोड़ना भी उचित नहीं है।
गुजरात में जनता लहर के चलते हुआ रिकॉर्ड मतदान इशारा कर रहा है कि मोदी के लिए बीच की स्थिति नहीं बनने वाली। मोदी या तो बड़ी जीत हासिल करने वाले हैं या एक बड़ी हार का सामना। विभिन्न राज्यों का चुनावी इतिहास बता रहा है कि कई राज्यों में मत प्रतिशत गिरा, फिर भी वर्षों की सत्ता ढह गई। इधर, पश्चिम बंगाल में बढ़े दो प्रतिशत मतदान ने ही 34 वर्ष का इतिहास बदलते हुए वामपंथियों से सत्ता छीनकर तृणमूल कांग्रेस को सौंपी।

17 प्रतिशत कम फिर भी फिसली सत्ता
कांग्रेस पार्टी सहित कई विश्लेषक गुजरात के बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को एंटी इनकम्बैंसी की उपज बता रहे हैं। बिहार और मध्य प्रदेश में जब सत्ता परिवर्तन हुआ, तो मत प्रतिशत बढ़ने के बजाय खासा गिरा। यहां सत्ता परिवर्तन का मूल कारण एंटीइनकम्बैंसी को माना जाता है। बिहार में वर्ष 2005 में मत प्रतिशत 17 प्रतिशत गिरा, फिर भी डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज लालू प्रसाद यादव की आरजेडी को बेदखल होना पड़ा।

वर्ष 2000 में हुए 62.57 प्रतिशत के मुकाबले वर्ष 2005 में 45.85 प्रतिशत मतदान ही हुआ था। इसी तरह, मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में मतदान 9 प्रतिशत कम हुआ और कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 1998 में 76.25 प्रतिशत मतदान हुआ था और कांग्रेस को लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का मौका दिया गया। लेकिन वर्ष 2003 में नौ प्रतिशत कम 67.25 प्रतिशत हुआ और जनता ने कांग्रेस के दस वर्ष के शासन को नाकार दिया और भाजपा को कमान सौंपी।

दो प्रतिशत ने बदली तकदीर
पश्चिम बंगाल के चुनाव की चर्चा भी यहां वाजिब होगी। वहां एंटी इनकम्बैंसी के चलते केवल दो प्रतिशत बढ़ी हुई वोटिंग ने 34 वर्ष से लगातार सत्ता पर काबिज वामपंथियों को हटाकर तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को कमान दे दी। वर्ष 2006 में 82 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबिक 1977 से सत्ता चला रहे वामपंथियों की सत्ता परिवर्तन के समय वर्ष 2011 में 84 प्रतिशत मतदान हुआ।

ये दिए जा रहे हैं तर्क
विश्लेषकों का कहना है कि बढ़ा मतदान मोदी के हित में है। युवा व महिला वर्ग में मोदी अधिक प्रभाव रखते हैं और इस बार इसी वर्ग ने अधिक वोटिंग की है। उनकी इच्छा मोदी को जिताकर उनका कद बड़ा करने की है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने अधिकतर टिकटें पुराने चेहरों को दी हैं, जिससे एंटीइन्कम्बैंसी की स्थिति बनी और अधिक मतदान हुआ। कुछ मान रहे हैं कि सौराष्ट्र के कड़े त्रिकोणीय मुकाबले के कारण अधिक लोग पोलिंग बूथ तक पहुंचे।

गुजरात का चुनावी इतिहास
गुजरात के चुनाव इतिहास को देखते हुए कहा जा सकता है कि जब भी मतदान प्रतिशत बढ़ा, तब भाजपा के पक्ष में रहा। वर्ष 1995 में सबसे अधिक 64.5 प्रतिशत मतदान हुआ था, उसके बाद भाजपा की पहली बार सरकार बनी थी। वर्ष 2002 में 61.54 प्रतिशत मतदान होने पर 127 सीटें भाजपा ने हासिल की थी, लेकिन 2007 में इससे कम 57.63 प्रतिशत मतदान हुआ था और भाजपा के हाथ 117 सीटें आई थीं।

मोदी की लग सकती है हैट्रिक
गुजरात में रिकॉर्ड 70 प्रतिशत से अधिक मतदान के बाद समाचार चैनलों व सर्वे एजेंसियों के एक्जिट पोल भाजपा के फिर सत्ता में आने की ओर इशारा कर रहे हैं। इनके नतीजों से लग रहा है कि मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री के तौर पर हैट्रिक लगाने वाले हैं। एक्जिट पोल के नतीजों के अनुसार गुजरात की 182 सीटों के मुकाबले भाजपा को 116 से 124 तक सीटें, कांग्रेस को 53 से 60 तक तथा अन्य को 4 से 6 तक सीटें मिलने का अंदाजा लगाया जा रहा है। हालांकि असल नतीजा 20 दिसम्बर को मतगणना के बाद आएगा।
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