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रावण की कमाई राम से ज्यादा, डांसर मालामाल

नीरज दीक्षित/कानपुर

Updated Tue, 09 Oct 2012 11:07 AM IST
rawan earns more money than ram in ramlila
‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए’। रामलीला का मंचन करने वाले कलाकार इस चौपाई को गाते ही नहीं, जीते भी हैं। रामलीला के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक भी प्रभु की लीला की तरह ही रंग बदलता रहता है अर्थात घटता-बढ़ता रहता है, लेकिन इससे कोई दुर्भाव नहीं। रावण का पात्र निभाने वाले कलाकार को राम जी बनने वाले कलाकार से ज्यादा पैसे मिलते हैं। रावण बनने वाले भी रामजी के भक्त हैं, लेकिन पैसे उनसे ज्यादा लेते हैं। लक्ष्मण जी भी कम रेट के हैं और डांसर की तो क्या कहिए, मंच पर तक-धिन-धिन करने वाली डांसर के रेट सबसे ज्यादा हैं।
रामलीला के अर्थशास्त्र की लीला जाननी हो तो आइए कानपुर के नौबस्ता स्थित चतुर्वेदी बिल्डिंग के पास मोहल्ले में। इसकी पहचान रामलीला के कलाकारों की मंडी के रूप में है। इन दिनों इस मोहल्ले में खूब रौनक है। शहर भर की रामलीला के आयोजक आ-जा रहे हैं। कोई राम जी को तलाश रहा है तो कोई रावण का पता पूछ रहा है। जैसा लीला का बजट है, वैसे ही रेट पर किरदार उपलब्ध हैं। आइए इसी मोहल्ले में चलकर ‘प्रभु की लीला देखते हैं’।

गणेश चर्तुर्थी के बाद से ही चतुर्वेदी बिल्डिंग स्थित अरुण बाजपेई की कपड़े की दुकान पर रामलीला कलाकारों की भीड़ लगनी शुरु हो जाती है। पचास वर्षीय अरुण खुद भी लीला में राजा जनक की भूमिका निभाते हैं। सारे कलाकार एक साथ बैठते हैं और मंडलाधीश के साथ नवरात्र से शुरु होने वाली रामलीला की तैयारी में जुट जाते हैं। कोई अपनी ड्रेस को धुलवाने की समस्या बताता है तो कोई नए धनुष, बाण और तलवार की जुगाड़ में जुट जाता है।

पान की दुकान में जय श्रीराम
15 साल से विभिन्न रामलीलाओं में भगवान राम का किरदार करने वाले संजय गांधी नगर निवासी राजेश कुमार पांडे की यशोदानगर हाइवे पर पान की दुकान है। रामलीला के दिनों में राजेश अपनी दुकान पर अपने बेटे को बैठाते हैं और खुद बोरिया-बिस्तर बांधकर लीला के लिए निकल पड़ते हैं। वे कहते हैं कि राम बनने वाले कलाकारों के रेट आज से नहीं, बल्कि कई सालों से कम ही हैं। शायद इसकी वजह यह भी है कि राम का किरदार ही पूरी लीला पर छाया रहता है। बाकी के कलाकार तो बीच बीच में नजर आते हैं। मुझे तो बस राम पर भरोसा है, वही मेरी नइया पार करेंगे। बस इतनी कृपा हो जाए कि बच्चों को पान की दुकान पर न बैठना पड़े।

माई नेम इज ‘रावण एमकाम’
यहां के रावण एमए, एमकाम हैं। रावण का रोल निभाने वाले गल्ला व्यापारी रत्नाकर मिश्रा इन दिनों कारोबार अपने कर्मचारियों के हवाले कर खुद लीला में रम जाते हैं। अच्छी कद-काठी, बड़ी-बड़ी मूंछें, भारी-भरकम आवाज, रावण के किरदार के लिए उपयुक्त हैं। ये लीला के समय तो रावण कहलाते ही हैं, शेष साल भर भी लोग इन्हें रावण कहकर ही पुकारते हैं। सोमवार को वे रिहर्सल कर रहे थे। रिहर्सल के दौरान जैसे ही वह गरजे ‘मामा मारीच तुम राम-लखन को बहलाना, मैं सीता को हर लाऊंगा’ सुनकर पास-पड़ोस के बच्चे दौड़े चले आए, बड़े भी ठिठक कर रुक गए। लगा वाकई रामलीला शुरू हो गई है। उन्होंने बताया कि लीला तो चार-पांच दिन ही करते हैं लेकिन पूरे साल लोग उन्हें रावण के नाम से ही पुकारते हैं। उन्हें बिल्कुल खराब नहीं लगता है क्योंकि बिना रावण के तो रामायण पूरी ही नहीं हो सकती। रावण राक्षस ही नहीं प्रकांड विद्वान भी था। सब राम की लीला है।

रामभक्त रावण
इसी मोहल्ले के दूसरे रावण यानी केके सिंह पेशे से शिक्षक हैं। लीला के दिनों में वह स्कूल से छुट्टी लेकर मंच पर अट्टहास करते नजर आते हैं। 20 साल से अलग-अलग रामलीलाओं में रावण बनते आ रहे हैं। उनका कहना है कि कभी पारिश्रमिक लेने का मन ही नहीं किया। जो मिल गया प्रभु का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया। श्रीराम की भक्ति मिल जाए, यही बहुत है।

फड़कती हैं भुजाएं, कड़कती है जुबान
संजय बाजपेई पिछले 22 साल से लक्ष्मण बन रहे हैं। दो-ढाई हजार रुपए तनख्वाह वाली प्राइवेट नौकरी करने वाले संजय लीला के दिनों में सब भूल जाते हैं, नौकरी रहे या जाए, लीला में कमी नहीं आने देते। कहते हैं कि लीला का वक्त नजदीक आते ही किसी और काम में मन नहीं लगता। बस भुजाएं फड़कने लगती हैं और रह-रहकर जुबान पर लक्ष्मण की ललकार ‘मत समझो कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है’ आने लगती है। क्या करूं लक्ष्मण का किरदार निभाते-निभाते इतनी निर्भीकता आ गई है कि अब कोई दूसरा किरदार रास ही नहीं आता।
 
राम को करके प्रणाम परशुराम करते हर काम
रामलीला का जिक्र हो और परशुराम न आएं, हो ही नहीं सकता। यहां परशुराम का किरदार निभाने वाले रामजी के चरणों के दास हैं। नाम भी बाल व्यास परशुराम है। कहते हैं रामलीला के किरदार ने ही जीवन तार दिया। लीला के मंच पर तो श्रीराम को प्रणाम करता ही हूं, शेष पूरे वर्ष भी उन्हीं का नाम लेकर सोता-जागता हूं। श्रीराम की कृपा से ही परिवार पल रहा है और क्या चाहिए। साल भर भागवत कथा करके प्रभु का नाम जपता हूं। जो पारिश्रमिक मिल जाता है, प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेता हूं।

राम ही देते रोटी
मंडलाधीश राजू राम की तो रोजी-रोटी ही रामलीला है। 35 साल से वे लीला में राम से लेकर परशुराम तक के किरदार निभा चुके हैं। आजकल राजा दशरथ बन रहे हैं। कहते हैं कि लीला खत्म होने के बाद आसपास के जिलों में वीर अभिमन्यु और राजा हरिश्चंद्र के नाटक करके घर खर्च चला लेते हैं, लेकिन जो आनंद रामलीला में मिलता है, वह कहीं और नहीं। वहीं राजा जनक का रोल निभाने वाले अरुण बाजपेई बताते हैं कि ‘सिंह का चेहरा लगाकर क्यों मुझे धोखा दिया’ सीता स्वयंवर के वक्त राजा जनक का यह कथन उन्हें सबसे अधिक पसंद है। उम्र के इस पड़ाव में भी लीला करने में पहले जैसा ही आनंद मिलता है।
 
सालों से भगवान राम की लीला करते हुए जीवन यापन करने वाले ये किरदार अब अपने बच्चों को मंच पर नहीं लाना चाहते। लगभग सभी कलाकारों का यही मानना है कि आने वाले समय में रामलीला का भविष्य अच्छा नहीं दिख रहा है। दर्शकों का रुझान भी अब लीला के पात्रों से अधिक डांसरों की ओर होता है। ऐसे में पात्रों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। कलाकारों की माने तो रामलीला को दर्शक अब टेस्ट मैच की तरह देखने लगे हैं। इस कारण भीड़ भी कम हो रही है। वहीं जब एक दिन की परशुरामी होती है तो 20-ट्वेंटी की तरह भारी भीड़ जुट जाती है।

ये हैं किरदारों के रेट
राम                 300 से 1500 रुपए प्रतिदिन
रावण                500 से 1800 रुपए प्रतिदिन
लक्ष्मण              400 से 1600 रुपए प्रतिदिन
सीता                100 से 700 रुपए प्रतिदिन
हनुमान              200 से 1200 रुपए प्रतिदिन
परशुराम             700 से 3000 रुपए प्रतिदिन
दशरथ               250 से 800 रुपए प्रतिदिन
विश्वामित्र             200 से 600 रुपए प्रतिदिन
जनक                200 से 600 रुपए प्रतिदिन
बाणासुर              200 से 500 रुपए प्रतिदिन
विदूषक              300 से 1000 रुपए प्रतिदिन
डांसर                2000 से 5000 रुपए प्रतिदिन
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