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अंगदान के लिए कैदियों ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी अनुमति

अमन तिवारी/फतेहपुर

Updated Wed, 28 Nov 2012 02:02 PM IST
prisoners knock for organ donations at supreme court door
पांच-छह साल पहले जिला जेल के कैदखाने से उठे देहदान के सवाल का आज तक जवाब नहीं मिल सका है। वर्ष 1997 और 2007 में यहां गैंगस्टर में निरुद्ध रामसिंह समेत डेढ़ सौ कैदियों ने पहले निचली अदालतों में दस्तक दी। फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। अब मामले पर केंद्रीय सूचना आयोग के डिप्टी रजिस्ट्रार सुनवाई कर रहे हैं।
कैदियों की मांग है कि आम भारतीय नागरिकों की तरह उन्हें भी अंग-प्रत्यर्पण की इजाजत मिलनी चाहिए। क्या उम्र कैद अथवा मृत्युदंड की सजा भोग रहा व्यक्ति अंगदान नहीं कर सकता है? भारतीय संविधान में ऐसी कानूनी व्यवस्था नहीं है। यूपी के फतेहपुर डीएम ने जेलर से इस मामले में जानकारी तलब की है।

मलवां पुलिस ने गैंगेस्टर के दो मामलों में वर्ष 1997 और 2007 में गांव बकौली निवासी राम सिंह को जेल भेज दिया था। जेल में राम सिंह ने कैदियों के भी देहदान की मांग उठाने की योजना बनाई। डेढ़ सौ कैदियों को जागरूक किया। वर्ष 2011 में वह जेल से बाहर आया और अदालत का दरवाजा खटखटाने के साथ ही 10 मार्च 2011 को मेडिकल कॉलेज, कानपुर में अपना अंगदान कर दिया।

उधर, भीतर-भीतर यह आवाज जिला जेल से नैनी जेल इलाहाबाद पहुंची। रामसिंह से प्रेरित 150 से अधिक अन्य कैदियों ने एटा, उन्नाव, इटावा, फीरोजाबाद, कन्नौज, इलाहाबाद आदि जिलों की एडीजे की अदालतों में देहदान के लिए याचिका दायर कर दी। जवाब मिला कि इस संबंध में अभी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।

इसके बाद रामसिंह ने अन्य कैदी सहयोगियों की मदद से सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर की और आरटीआई के माध्यम से इस प्रकरण की नियमावली मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष 18 जून को रजिस्ट्रार सुनील थामस की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर दी। कमेटी ने आरटीआई की धारा 2-एफ के तहत राम सिंह की याचिका पर विचार करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग में अपील करने का सुझाव दिया। अब वहां डिप्टी रजिस्ट्रार विजय भल्ला की अध्यक्षता में एक कमेटी इस प्रकरण पर विचार कर रही है। इधर, जिलाधिकारी कंचन वर्मा ने जिला जेल अधीक्षक से इस प्रकरण से संबंधित पूरी जानकारी तलब कर ली है।

ये हैं सवाल, जिनके नहीं मिले जवाब
- क्या जिला कारागार में न्यायिक अभिरक्षा में रहते हुए विचाराधीन बंदी या सजायाफ्ता कैदी मरणोपरांत देहदान अथवा नेत्रदान कर सकता है? यदि नहीं तो किन कारणों से?
- न्यायालय से सजा पाए व्यक्ति का अपील करने वाला कोई भी नहीं है तो यह अधिकार जिला कारागार के किस अधिकारी के पास होता है और जिला कारागार में वर्ष 2000 से अब तक यह व्यवस्था कितने कैदियों को उपलब्ध कराई गई है?
- जिला कारागार में काम करने वाले बंदियों को रोजाना कितने रुपए का पारिश्रमिक दिया जाता है?
- वर्ष 2000 से अब तक कितने लोगो को लाभ दिया गया है?
- न्यायिक अभिरक्षा में सजायाफ्ता कैदी यदि आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा काट रहा है तो वह मरणोपरांत देहदान का संकल्प पत्र भर सकता है या नहीं?

लाखों लोगों का भला हो जाएगा
एक व्यक्ति आंख, गुर्दे सहित अपने 37 अंगों का दान कर सकता है। यदि कैदियों की मुहिम पर कामयाबी की मुहर लग जाती है तो हजारों पीड़ितों का भला हो सकेगा। एम्स, दिल्ली में अंग पुनर्स्थापन बैंक है। एक अनुमान के मुताबिक देशभर में एक से सवा लाख लोग आंख के लिए और ढाई से तीन लाख लोग गुर्दे के लिए कतार में हैं।
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