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आईआईटी की राह और हुई कठिन, अवसर भी घटेगा

बृजेश सिंह/नई दिल्ली

Updated Thu, 28 Jun 2012 12:00 PM IST
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आईआईटी में प्रवेश पाने वाले छात्रों को अगले साल से जहां ज्यादा चुनौतियों को सामना के लिए तैयार रहना होगा वहीं बोर्ड परीक्षा में 20 पर्सेंटाइल के चलते अब कम छात्रों को अवसर मिल पाएगा। अभी तक बोर्ड में 60 फीसदी तक अंक लाने के नियम के चलते लाखों छात्रों को इस परीक्षा में शामिल होने का अधिकार सीमित हो जाएगा।
अगले साल से आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए अवसरों की चुनौती को समझने के लिए हम वर्ष 2012 का उदाहरण लेंते हैं तो इस साल साढ़े पांच लाख छात्रों ने जेईई प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लिया था। लेकिन यदि अगले वर्ष के लिए तय फार्मूला लागू होता तो इस परीक्षा के लिए केवल चार लाख छात्रों को ही परीक्षा में बैठने की पात्रता होती। बीस पर्सेंटाइल में देश भर के स्कूल बोर्डों में साइंस के चार लाख से ज्यादा छात्र हर साल नहीं पास होते हैं।

उल्लेखनीय है कि बोर्ड का रिजल्ट चाहे जितना अच्छा व खराब हो पर्सेंटाइल सिस्टम में कुल छात्रों की संख्या पास होने वाले छात्रों के अनुपात में ही स्थिर रहेगी। पुराने पैटर्न में साठ प्रतिशत अधिक अंक लाने वाले सक्षी छात्रों को प्रवेश परीक्षा में शामिल होने का अधिकार था।

सीबीएसई चेयरमैन विनीत जोशी ने बताया कि यदि वर्ष 2012 के बोर्ड रिजल्ट के आधार पर 20 पर्सेंटाइल तय किया जाए तो यूपी बोर्ड में 65 प्रतिशत अथवा अधिक अंक पाने वाले छात्र ही आईआईटी के लिए योग्य उम्मीदवार होंगे। सीबीएससी बोर्ड में 78 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले छात्र 20 पर्सेंटाइल के दायरे में शामिल होंगे। वर्ष 2012 तक जेईई प्रवेश परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों को बोर्ड में (सामान्य वर्ग) 60 प्रतिशत तक अंक होना जरुरी था।

आईआईटी में प्रवेश पाने के लिए केवल बोर्ड परीक्षा में ही ज्यादा अंक लाना जरुरी नहीं होगा बल्कि जेईई मेन परीक्षा में भी आल इंडिया स्तर पर आयोजित परीक्षा टॉप डेढ़ लाख छात्रों में शामिल होना होगा। अन्यथा एडवांस पेपर की परीक्षा में शामिल होने का मौका ही नहीं मिल पाएगा। इस तरह दो शर्तों को पूरा करने के बाद जेईई मेन में हाई रैंकिंग हासिल करने पर ही इंजीनियरिंग में प्रवेश करना संभव होगा।

प्रवेश परीक्षा के नये पैटर्न से छात्रों को भले ही इंटर की परीक्षा को अब गंभीरता से लेने के लिए दबाव बन जाए लेकिन उन पर परीक्षाओं के दबाव को कम करने तथा कोचिंग घटाने का मकसद कहीं से पूरा होता नहीं दिख रहा है।
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