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‘राजा‘ को रास आई पहाड़ की डगर!

विजेंद्र/हल्द्वानी

Updated Wed, 27 Jun 2012 12:00 PM IST
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जंगल के राजा ‘बाघ’ को मैदान की जगह पहाड़ की डगर रास आ रही है। तराई के जंगलों में अपनी सल्तनत छोड़ वह नैनीताल जैसे पहाड़ों की तरफ मूवमेंट कर रहा है। बाघ के पर्वतीय क्षेत्र की तरफ बढ़ रही मूवमेंट को लेकर वनाधिकारियों का भी माथा ठनका है। नैनीताल वन प्रभाग ने बाघ के व्यवहार में आ रहे इस बदलाव और माइग्रेशन के कारणों का पता लगाने की योजना बनाई गई है।
बाघ का पसंदीदा इलाका तराई का जंगल है। वहां उसे घात लगाने के लिए बड़े-बड़े घास के मैदान, हिरन, सांभर जैसे शिकार भी खूब मिलते हैं। पर अब बाघ को पहाड़ की डगर रास आने लगी है। वह नैनीताल, भीमताल जैसे पर्वतीय इलाकों के जंगलों की तरफ मूवमेंट कर रहा है। इस मूवमेंट में नदियां बाघों के लिए कॉरिडोर की तरह मदद कर रही है।

वनाधिकारियों के अनुसार तराई की नदियों का उद्गम पहाड़ों में है। ऐसे में बाघ इनके जरिए पहाड़ों में पहुंच रहे हैं। कार्बेट पार्क के बगल से बहती कोसी नदी के जरिए ही बाघों के नैनीताल से सटे बेतालघाट, विनायक और कुंजाखेड़ा तक पहुंचने के प्रमाण वन महकमे को मिले हैं। ऐसी ही संभावना दाबका और निहाल जैसी नदियों को लेकर भी है।

बाघ के तराई से हिल के तरफ बढ़ते माइग्रेशन ने वनाधिकारियों को भी चिंता में डाल दिया है। महकमा अब यह पता करने की कोशिश में है कि कहीं बढ़ता तापमान तो इसका कारण नही, जिससे बचने को बाघ ठंडे इलाके की तरफ कूच कर रहा है। इसे लेकर मुख्य वन संरक्षक कुमाऊं ने एक विस्तृत अध्ययन की योजना बनाई है। नैनीताल डिवीजन के डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि स्टडी में बाघों के माइग्रेशन पैटर्न के बारे पता करेंगे।

वह कहते हैं कि बात केवल गर्मी की नहीं है, जंगल कम होते जल स्रोत और शिकार (भोजन) भी बाघों के पहाड़ की तरफ रुख करने का कारण हो सकता है। इसलिए इस बाबत भी अध्ययन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए स्वचालित कैमरे मंगाए गए हैं। इसके अलावा, गैर सरकारी संगठनों से भी मदद ली जाएगी।

तिब्बत तक जाता था बाघ
हल्द्वानी। ईटी एटकिंसन ने 1866 में ‘हिमालयन गजटियर’ में बाघ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी है। एटकिसंन के अनुसार बाघ तराई से लेकर 10 से 11,000 फीट तक जाता है। एटकिंसन के अनुसार ऐसा विश्वास है कि कभी-कभार बाघ तिब्बत तक भी पहुंच जाता था।
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