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पं. रविशंकरः अब कैसे बजेगी रागिनी राग की बांहों में...

वाराणसी/गाजीपुर/ब्यूरो

Updated Thu, 13 Dec 2012 10:40 AM IST
memories of sitar maestro pandit ravishankar
बीन के तार की मदभरी अंगुलियां, जाम पीती रहीं तुम पिलाते रहे/ होश में था न कोई हृदय थे मगन, राग रसिया स्वयं गुनगुनाते रहे/ तुम स्वरों से सगाई रचाते रहे, मैं सहकता रहा रात भर राह में, बज उठी रागिनी राग की बांह में/ तुम ख्यालों में झाला बजाते रहे, द्रुत विलंबित की बाजी लगी दांव में, बज उठी रागिनी राग की बांहों में... यह अंश है उस गीत का जिसे वर्ष 1982 में पं. रविशंकर के लिए काशी के नवगीतकार पं. अशोक मिश्र सामयिक ने लिखा था।
इस गीत में पं. रविशंकर के कलाकारी और कलाकार जीवन की बहुत सी बारीकियां समाहित हैं। सितार के पर्याय बन चुके पं. रविशंकर की यादें बनारस के सुधि श्रोताओं के जेहन में हमेशा तैरती रहेंगी। संगीत परिषद के विनोद अग्निहोत्री बताते हैं कि संगीत परिषद की सभाओं में उनके आगमन का क्रम 17 जनवरी 1959 से शुरू हुआ। टाउनहाल के मैदान में सजी संगीत सभा में उनके साथ तबले पर पं. किशन महाराज ने संगत की थी। इसके उपरांत वर्ष 1961, 1962, 1964 और 1966 में संगीत परिषद के कार्यक्रम में शामिल हुए।

तीन पीढ़ियां रहीं गाजीपुर में
पं. रविशंकर का गाजीपुर के मरदह ब्लाक स्थित नसरतपुर गांव से गहरा नाता था। अंग्रेजों के जमाने में ही बंगाल से आकर उनके दादा-परदादा यहां बस गए थे। तीन पीढ़ियों के बाद इसी परिवार के श्याम शंकर के पुत्र के रूप में रविशंकर महाराज ने जन्म लिया और गांव के ही नर्तक-वादक मातादीन से सितारवादन की कला सीखी। बाद में वह अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा गए। नसरतपुर गांव में उनका पुश्तैनी मकान अब भी मौजूद है।

विद्यालय जस का तस, बदला जन्मस्थल का स्वरूप
बनारस का बंगाली टोला इंटरमीडिएट कालेज, जहां देश को आजाद कराने वाले कई क्रांतिकारियों ने शिक्षा अर्जित की। इस विद्यालय और उन कक्षाओं का स्वरूप तो यथावत है किंतु इस विद्यालय के ठीक बगल वाली गली स्थित जिस भवन में सात अप्रैल 1920 को रविशंकर का जन्म हुआ उसका स्वरूप बिल्कुल बदल चुका है।

बंगाली टोला इंटर कालेज में पं. रविशंकर की आरम्भिक शिक्षा हुई। वर्ष 1924 से 1930 तक अध्ययन के छह वर्ष की स्मृतियां विद्यालय के भूतल के कक्षों में सिमटी पड़ी हैं। वर्ष 1930 में कालेज के जिस कक्ष में बालक रविशंकर ने कक्षा छह की परीक्षा दी थी संयोग से बुधवार की सुबह भी उस कमरे में कक्षा छह के विद्यार्थी परीक्षा दे रहे थे। इस कमरे का स्वरूप यथावत है।

बाबा ने जो रविशंकर को दिया किसी को नहीं मिला
बैरिस्टर पिता की संतान, चार भाइयों में सबसे छोटे पं. रविशंकर ने ही अपने परिवार में सबसे अधिक यश भी अर्जित किया। उनकी यशकीर्ति के पीछे सबसे बड़ा हाथ मैहर घराने के अप्रतिम कलाकार उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खां का था। वर्ष 1936 से लेकर 1978 के लंब अंतराल तक बाबा के सानिध्य में रहने वाले पं. रविशंकर को बाबा ने वीणा अंग के सितारवादन की शिक्षा दी।

बाबा अलाउद्दीन खां साहब के दौर में इनायत खां साहब और इमदाद खां साहब जैसे मानिंद सितारवादक हुआ करते थे लेकिन पं. रविशंकर के सितार की तालीम बिल्कुल अलग तरीके से हुई। वैसे वह सुपुत्री अन्नपूर्णा देवी, पुत्र अली अकबर और शिष्य ज्योतिन भट्टाचार्य को अक्सर एक साथ सितार और सरोद की शिक्षा दिया करते थे लेकिन पं. रविशंकर को वे हमेशा ही अकेले सिखाते। अन्नपूर्णा देवी को बहुत स्नेह करते थे किंतु पं. रविशंकर को उन्होंने जो कला सिखाई वह अपने किसी अन्य शिष्य को नहीं दी।

संकट मोचन में थी अगाध श्रद्धा
पं. रविशंकर की जितनी श्रद्धा अपनी कला में थी उतनी ही श्रद्धा वह संकट मोचन के दरबार के प्रति भी रखते थे। पं. रविशंकर के बालसखा प्रख्यात तबलावादक कविराज आशुतोश भट्टाचार्य के मुख से सुने संस्मरणों की याद ताजा करते हुए पं. परमानंद दुबे बताते हैं पं. रविशंकर बाल्यावस्था से ही संकट मोचन के भक्त थे। वर्ष 1936 में सितार की विधिवत शिक्षा के लिए बाबा अलाउद्दीन खां साहब के पास मैहर जाने से पूर्व 1929 से 1936 तक शायद ही कोई ऐसा मंगल या शनिवार का दिन रहा हो जब दोनों मित्र गलबहियां डाले संकट मोचन मंदिर न गए हों।

1926 से 1930 तक बंगाली टोला इंटर कॉलेज में साथ पढ़ने के बाद रविशंकर अपने सबसे बड़े भाई उदयशंकर की बैले टीम के साथ भी काम करने लगे थे। अक्सर उनका बाहर जाना आना होता। जब मैहर रहने लगे तो कभी कभी उनका बनारस आना होता था।

फिर साथ नहीं दिखी पिता-पुत्र की जोड़ी
वर्ष 1984 में 15 नवंबर को काशी में हुए रिम्पा के अंतिम आयोजन में पं. रविशंकर और उनके ज्येष्ठ पुत्र शुभो शंकर ने भी सितारवादन किया था। पिता-पुत्र की जोड़ी बनारस में पहली और आखिरी बार एक साथ मंचासीन हुई थी। उस दिन की स्मृति को काशी के एक सुधि श्रोता बब्बी कुमार ने अपनी आटोग्राफ बुक में सहेज रखा है।

बनारस आने की साध रही अधूरी
बीती सदी में नब्बे के दशक में पं. रविशंकर भले स्थाई रूप से अमेरिका में बस गए लेकिन जीवन के आखिरी दिनों में वे बनारस आना चाहते थे। उनकी यह साध उनकी के साथ चली गई। काशी में संगीत परिषद के कार्यक्रमों में पुरानी सहभागिता के चलते करीब तीन वर्ष पूर्व संगीत परिषद के प्रमुख सदस्य विनोद अग्निहोत्रि ने पुन: उनसे इंटरनेट के जरिए संपर्क साधा। एक वर्ष पूर्व उन्होंने बनारस आने की इच्छा जताई थी।


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