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सपा, बसपा व कांग्रेस: तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई

लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी/ब्यूरो

Updated Fri, 07 Dec 2012 10:28 AM IST
love fighting between sp bsp and congress
यूपी के अखाड़े में सपा और बसपा एक-दूसरे को फूंटी आंख भी नहीं देखना चाहते हैं, पर एफडीआई पर एकसाथ खड़े दिखाई दिए। दोनों कांग्रेस पर आरोप भी लगाते हैं और उसके साथ भी खड़े दिखाई देते हैं।
महंगाई और विदेशी निवेश पर भारत बंद और प्रदेश बंद में सपा भी शामिल थी। पर जब संसद में एफडीआई के विरोध का अवसर आया तो सपा दूसरी भाषा बोलने लगी। भाजपा के पाले में न खड़े होने का तर्क आ गया।

लोकसभा में मुलायम सिंह यादव ने एफडीआई पर सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन बात जब मतदान तक पहुंची तो सपा मुखिया बाहर चले गए। ताकि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को कोई दिक्कत न खड़ी हो।

बसपा भी पहले एफडीआई को गरीबों के खिलाफ षड्यंत्र मान रही थी। कांग्रेस के विरोध में थी। पर लोकसभा में जब मतदान का क्षण आया तो वह भी बाहर चली गई। राजनीति के अखाड़े के इन दो दुश्मन पहलवानों का एक रुख एक तरह से कांग्रेस की मदद करने वाला था।

आज सपा की सरकार है तो भी जब-तब कांग्रेस निशाने पर रहती है। पहले बसपा सरकार थी तो कांग्रेस लगातार निशाने पर रहती थी। मनरेगा पर तो बसपा सरकार के पूरे कार्यकाल में दिल्ली से रार ही चलती रही तो मायावती ने शायद ही केंद्र की सरकार पर उत्तर प्रदेश की मदद न करने का आरोप लगाने का कोई मौका छोड़ा हो।

पर, दिल्ली में बात जब एफडीआई के समर्थन व विरोध की आई तो दोनों दल, कांग्रेस के साथ खड़े नजर आए। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पाखंडपूर्ण राजनीति के इस चरम बिंदु पर पहुंचाने के पीछे इन दोनों दलों की अपनी-अपनी वजहें हैं।

कोई न कोई वजह तो जरूर है
वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक अवधेश कुमार कहते हैं कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि जब लड़ाई सीबीआई बनाम एफडीआई हो जाए तो क्या किया जा सकता है। भले ही किसी के पास सीबीआई या अन्य किसी वजह का कोई प्रमाण न हो, लेकिन जनधारणा यही है कि कुछ न कुछ मामला जरूर है। जिसने इन दोनों राजनीतिक दलों को लोकसभा में एक ही भूमिका में खड़ा कर दिया। सदन में तर्क चल गए हैं, लेकिन जनता सब जानती है।

लोकसभा चुनाव जल्दी नहीं चाहती बसपा
बसपा के एफडीआई पर केंद्र सरकार को बचाने की एक वजह लोकसभा चुनाव हो सकते हैं। बसपा नेताओं को पता है कि सपा जितने अधिक से अधिक समय तक सत्ता में रहेगी, उतना ही उसका फायदा बसपा को होगा। सत्ता विरोधी लहर का लाभ उसे मिलता है तो मुख्य मुकाबले में होता है।

बसपा के एक प्रमुख नेता ने लोकसभा में मतदान के बाद निजी बातचीत में यह कहा भी। इस नेता के अनुसार, सपा जितने दिन सत्ता में रहेगी उसकी लोकप्रियता घटेगी। इसका लाभ बसपा को ही होगा। इसलिए लोकसभा चुनाव जितनी देर में हो, उतना ही बसपा का फायदा। इसलिए हमारी कोशिश है कि केंद्र सरकार को अभी कोई खतरा न खड़ा हो।

सपा नहीं चाहती बसपा व कांग्रेस में निकटता
सपा की केंद्र सरकार बचाने की वजह चुनाव तो नहीं दिखती, लेकिन उसकी कोशिश बसपा व कांग्रेस के रिश्ते बहुत प्रगाढ़ न होने देने की जरूर हो सकती है। उसे पता है कि बसपा और कांग्रेस की अति निकटता उसके लिए समस्या खड़ी कर सकती है।

साथ ही लोकसभा के चुनाव में अगर इन दोनों दलों के बीच उत्तर प्रदेश में परोक्ष या अपरोक्ष किसी तरह का कोई गठबंधन बन गया तो भी सपा के लिए समस्या खड़ी हो जाएगी। इसलिए उसने परदे के पीछे से कांग्रेस सरकार को राहत देकर उसे बसपा के साथ जाने से रोकने की कोशिश की है।

भाजपा हो सकती है एक कारण
भले ही एफडीआई पर सरकार की हार से तत्काल चुनाव की बाध्यता न खड़ी होती हो, लेकिन दोनों दलों को पता है कि सरकार की पराजय के बाद भाजपा या एनडीए सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाएंगे। एनडीए को एक तरह से मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल जाएगी। सरकार को परास्त करने का श्रेय भी भाजपा के खाते में चला जाएगा। दोनों दलों को यह भी पता है कि चुनाव की नौबत आई और कांग्रेस की सीटें घटीं तो निश्चित रूप से एनडीए को बढ़त मिल जाएगी।

दोनों दलों को कोई नुकसान नहीं
सपा व बसपा दोनों की राजनीति का आधार जाति है। दोनों को ही यह पता है कि उन्हें जिन लोगों का वोट मिलता है, उनके बीच एफडीआई की राजनीति का कोई बहुत अर्थ नहीं है। फिर सपा जहां इसे अपनी सरकार में लागू न करने का तर्क देकर लोगों के गुस्से को कम कर सकती है तो बसपा यह कह सकती है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता में आएंगे तो भी एफडीआई को लागू नहीं करेंगे। इसलिए भी दोनों के रणनीतिकारों ने सोचा होगा कि अकारण कांग्रेस से बैरभाव क्यों बढ़ाया जाए।

विवशता का हावी होना खतरनाक
एफडीआई पर सपा व बसपा का रुख इस बात को साबित करता है कि कुछ नेताओं की सोच और सियासत विवशताओं पर निर्भर है। इस मुद्दे पर दोनों दलों ने पाखंडपूर्ण राजनीति का अनुसरण किया है। राजनीतिक लिहाज से ऐतिहासिक महत्व वाले उत्तर प्रदेश के इन दोनों दलों की इस तरह की नीति ने राजनीति को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो हर उस आदमी के लिए चिंता का विषय बन गई है जो देश के बारे में चिंता करता है।

सिद्धांतों पर तात्कालिक विवशताओं का हावी होना खतरनाक है। उत्तर प्रदेश के लोगों को जानना होगा कि भले ही एफडीआई उत्तर प्रदेश में न लागू हो, लेकिन इसने इस राज्य के भी लगभग 40 लाख खुदरा कारोबारियों के लिए संकट का मार्ग खोल दिया है।-अवधेश कुमार, राजनीतिक विश्लेषक
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