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जन्मदिन विशेषः खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Mon, 19 Nov 2012 01:33 PM IST
laxmi bai was the queen of jhansi fought gallantly
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।
सुभद्रा कुमार चौहान की इन पंक्तियों ने रानी लक्ष्मीबाई की स्मृतियों को आज भी संजो कर रखा है। अंग्रेजों के ‌ख्रिलाफ आजादी का नारा बुलंद करने वाली रानी लक्ष्मीबाई संभवतः भारतीय स्वंतत्रता संग्राम की पहली वीरांगना थी।  

लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से इन्हें मनु बुलाते थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई तथा पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे।

मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनके मां की मृत्यु हो गई। घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता ने उन्हें अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए। बाजीराव के दरबार में मनु ने अपने चंचल ओर सुंदर स्वभाव से सबका मन मोह लिया।

लोग उन्हें प्यार से 'छबीली' बुलाते। १८४२ में इनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ, और ये झांसी की रानी बनीं। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन १८५१ में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर लेकिन चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गई।

सन १८५३ में राजा गंगाधर राव की तबीयत बहुत ज्यादा खराब होने के कारण उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गई। पुत्र गोद लेने के बाद कुइ दिनों बाद ही राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।

डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अंतर्गत ब्रितानी राज्य ने दामोदर राव जो उस समय बच्‍चे ही थे, को झांसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया, तथा झांसी राज्य को ब्रितानी राज्य में मिलाने का निर्णय लिया। तब रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रितानी वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया। यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई लेकिन इसे खारिज कर दिया गया।

ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना जब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज को रानी के सालाना खर्च में से काट लिया गया। इसके साथ ही रानी को झांसी के किले को छोड़ कर झांसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हर कीमत पर झांसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था।

झांसी १८५७ के संग्राम का एक प्रमुख केंद्र बन गया जहां हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गई और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया।

१८५७ के सितंबर-अक्तूबर म‌हीने में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया। १८५८ के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ्तों की लडा़ई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। हालांकि रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गई। रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।

तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़तेरानी लक्ष्मीबाई की मौत हो गई।

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