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भूमि अधिग्रहण: किसानों को 50 साल बाद मिला मुआवजा

नई दिल्ली/पीयूष पांडेय

Updated Fri, 21 Dec 2012 09:38 PM IST
land acquisition supreme court judgement
देर से ही सही, लेकिन आखिरकार किसानों को कुछ हद तक इंसाफ मिल ही गया है। हालांकि इसके लिए उन्हें 50 साल तक का लंबा इंतजार करना पड़ा। पंजाब के पठानकोट में 1962 में भूमि अधिग्रहण कानून के तहत जमीन गंवाने वाले किसानों को सुप्रीम कोर्ट की ओर से मुआवजे की राहत मिली है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस रवैये पर भी कड़ी नाराजगी भी उस समय जतायी है, जिसके तहत सरकार सचिव सहित चार अधिकारियों का वेतन रोकने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च अदालत पहुंची। शीर्षस्थ अदालत ने किसानों को राहत देते हुए केंद्र को उन्हें चार माह के भीतर मुआवजे के साथ अन्य लाभ उपलब्ध कराने का आदेश दिया है।

सर्वोच्च अदालत ने हालांकि मामले से संबंधित सचिव सहित चार अधिकारियों का वेतन रोकने का हाईकोर्ट का आदेश दरकिनार कर दिया है। साथ ही आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 18 सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट में दाखिल करने को कहा है। ऐसा न किए जाने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला चलाया जाएगा।

जस्टिस जीएस सिंघवी व जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने केंद्र की याचिका का निपटारा करते हुए कहा है कि अधिग्रहित जमीन (करीब 10 एकड़) से संबंधित मुआवजे पर आपत्तियों का निपटारा हाईकोर्ट की ओर से जल्द से जल्द किया जाएगा। मगर  निपटारा हर हाल में नौ माह की अवधि में किया जाएगा।

सरकार चार माह में अधिग्रहण की प्रक्रिया को पूरा करने के साथ मुआवजा व अन्य लाभ किसानों को देगी। याद रहे कि भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के प्रावधानों का अनुपालन किए बिना किसानों से यह जमीन आपात उपबंध के तहत सीमा सड़क संगठन ने ली थी।

सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन करने के केंद्र के आश्वासन पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पांच दशकों से लोग न्याय का इंतजार कर रहे हैं। उनकी जमीन लेकर मुआवजा तक नहीं दिया गया। जबकि सात साल से मामला न्यायपालिका में है और हाईकोर्ट ने आदेश भी दिया।

सर्वोच्च अदालत के फैसले के मुताबिक 50 साल पहले किए गए अधिग्रहण के चलते खेती करने से वंचित हुए गरीब किसानों के पास इतने साधन नहीं थे कि वह अदालत का दरवाजा खटखटाते। इसी वजह से 26 साल के बाद एक वकील ने किसानों की मदद की और जमीन लौटाने संबंधी नोटिस प्राधिकरणों को भेजा।

मगर सरकार ने ध्यान नहीं दिया, जिसके बाद 2005 में मुद्दा हाईकोर्ट पहुंचा। जहां दो आदेश का अनुपालन न किए जाने पर हाईकोर्ट ने मुआवजा देने के आदेश के साथ अधिकारियों का वेतन रोक दिया।
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