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सवाल बस एक, नरेंद्र मोदी पीएम या नहीं

अहमदाबाद/इन्दुशेखर पंचोली

Updated Mon, 10 Dec 2012 11:24 PM IST
just one question modi will be pm or not
नरेंद्र मोदी का नाम जुबान पर लाने से परहेज और निजी आरोप लगाने से तौबा करने के बावजूद गुजरात विधानसभा चुनाव उस दिशा में बढ़ चला है, जिससे कांग्रेस बचना चाहती थी। पहले दौर का प्रचार खत्म होने के 24 घंटे पहले तक बने माहौल में उभरकर आया है, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं, यह चुनाव इस सवाल पर जनमत-संग्रह है। प्रचार के दौरान विकास की जमकर चर्चा हुई, भ्रष्टाचार व हिंदुत्व की भी और मोदी की तानाशाही की भी।

लेकिन, आम मतदाताओं के बीच मुख्य सवाल मोदी की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी पर सिमट गया। आरएसएस की इस पहल को भाजपा ने अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया। इसलिए संभलते-संभलते भी केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे जब वड़ोदरा में बोल गए कि 2014 में राहुल गांधी कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, तो मोदी के सियासी कद को राहुल की नाकामियों के सापेक्ष नापने का सिलसिला शुरू हो गया।

अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं पर चुप्पी साधे रहने वाले मोदी ने भले प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर कभी कुछ न कहा हो, लेकिन चुनाव के दौरान मोदी और पूरी भाजपा, अलग-अलग दिशाओं में प्रचार करते नजर आते हैं। मोदी का अपना प्रिय विषय विकास है, तो मियां मुशर्रफ की टक्कर में अहमद मियां पटेल के संबोधन से हिंदुत्व का झंडाबरदार होने का एहसास भी वे कराते रहते हैं।

सोनिया बेन या सोनिया मैडम और मौन-मोहनसिंह के साथ केंद्र के भ्रष्टाचार पर हमले करने में भी उन्हें मजा आता है। अलबत्ता बाकी उम्मीदवारों और नेताओं के पास अपनी सभाओं में भीड़ जुटाने और बनाए रखने के लिए नरेंद्र मोदी के गुणगान के अलावा कोई विषय नहीं है। खुद को पीएम का स्वाभाविक दावेदार मानने वाले लालकृष्ण आडवाणी तक इसी कवायद में प्रचार के बीच मोदी को कुशल शासक जैसी पदवी दे गए, तो सुषमा स्वराज से अरुण जेटली तक लगभग हर नेता ने मोदी को पीएम पद के लिए काबिलियत के सर्टिफिकेट से नवाज दिया।

खास बात यह है कि भाजपा का आधिकारिक स्टैंड लोकसभा चुनाव के समय पीएम का उम्मीदवार घोषित करने का है। राहुल गांधी की तरह मोदी को किसी नेता ने बतौर उम्मीदवार पेश नहीं किया। मगर, उन्हें पीएम पद के काबिल बताने की होड़ मची हुई है।

...यह हथियार यूं आ रहा काम

दस साल के शासन के बाद मोदी ही नहीं, हर सरकार के खिलाफ एंटी-इनकम्बेन्सी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानी जा सकती है। मोदी सरकार के साथ भी ऐसा है। मोदी पर भले ही कोई निजी आरोप न हो, लेकिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। केशुभाई की बगावत को कांग्रेस की शह नहीं मिलती, तो मुमकिन था कि एक दर्जन से ज्यादा मंत्री अभी घर बैठे होते। मगर, ऐसा हो न सका। ऐसे में, गुजरातियों खासतौर पर मध्यम वर्ग में ऐसा भरोसा जगाना कि सीएम के लिए डाला गया, आपका वोट देश का प्रधानमंत्री तय करेगा, रोमांच के साथ उत्साह जगाता है। एकमत गुजरात का नारा वोटरों को मोदी को अलग नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करता है। एंटी इनकम्बेन्सी भुलाकर बड़े कॉज में भागीदार बनाता है। यही कारण है, अपनी महत्वाकांक्षाओं पर चुप्पी साधने के बावजूद मोदी गुजराती-अस्मिता का पेटेंट अपने अलावा किसी ओर के नाम नहीं करना चाहते। इसीलिए जब मौजूदा नाकारा विधायकों को दोबारा मैदान में उतारने पर विरोध होता है, तो वे मतदाताओं को कहते हैं कि उनकी तरफ नहीं, मेरी तरफ देखिए।

कांग्रेस की असहजता
सियासी समीक्षक तो यहां तक दावा करते हैं कि इस बार चुनाव में मोदी के अलावा कोई मुद्दा है ही नहीं। उनका कहना है, एक पार्टी यानी कांग्रेस हारने के लिए पूरी मेहनत कर रही है, तो भाजपा जीतने के लिए सारी ताकत झोंके हुए है। स्तंभकार विद्युत ठाकर कहते हैं, कांग्रेस न तो खुद जीतने की स्थिति में है, न जीतने के लिए लड़ रही है। उसकी मंशा है कि मोदी को कट टु हिज साइज कर दे। राहुल गांधी इसीलिए मोदी से मुकाबिल नहीं हो रहे। राजनीति-विज्ञानी प्रकाश शाह का कहना है, अगर कांग्रेस जीतने के लिए लड़ती, तो मोदी विरोधी सभी ताकतों को साथ लेना चाहिए था।

...ताकि जवाब ने दे पाएं मोदी
जानकारों का कहना है कि प्रचार के आखिरी दिन राहुल गांधी की सभा का मतलब यही है कि मोदी उनके उठाए मुद्दों का जवाब न दे पाएं। हालांकि यह तय है कि वे भी मोदी का नाम लिए बिना भाजपा सरकार को ही कोसने वाले हैं।

मोदी का नया दांव...
इस बीच, मोदी ने सोमवार को नया दांव चल दिया है। मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में अपने को गुजरात का सेवक बताते हुए दावा किया कि वे 2017 में भी गुजरात में ही रहने वाले हैं। उन्होंने कहा, गुजरात को अव्वल बनाने की उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं आएगी।
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