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चला गया सितार का सरताज, यादों में रहेंगे सुर

नई दिल्‍ली/सैन डियागो/एजेंसी

Updated Wed, 12 Dec 2012 09:09 PM IST
indian music orphaned says javed akhtar
भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम समेत पूरी दुनिया में लोकप्रियता के नए आयाम देने वाले महान सितार वादक और कंपोजर पंडित रवि शंकर नहीं रहे। सितार के इस सरताज का अमेरिका के सैन डियागो में बुधवार को निधन हो गया। वह 92 वर्ष के थे।
रवि शंकर के सुरों के जादू का असर यह था कि द बीटल्स जॉर्ज हैरिसन और यहूदी मेनुहिन जैसे दिग्गज भी उनसे जबरदस्त प्रभावित रहे। पश्चिम के मुल्कों में हर घर में पहचान बनाने वाले वह पहले भारतीय कलाकार थे। रवि शंकर की पिछले बृहस्पतिवार को कैलिफोर्निया के ला जोला में स्क्रिप्स मेमोरियल हॉस्पिटल में हार्ट वाल्व सर्जरी हुई थी। इस अस्पताल में ही उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें पिछले सप्ताह यहां भर्ती कराया गया था।

रवि शंकर की पत्नी सुकन्या और बेटी अनुष्का शंकर ने एक बयान में कहा कि हमें भारी दुख के साथ बताना पड़ रहा है कि पंडित रवि शंकर नहीं रहे। एक अन्य बयान में रवि शंकर फाउंडेशन और ईस्ट मीट्स वेस्ट म्यूजिक ने कहा कि शंकर को सांस और दिल संबंधी परेशानी थी।

पिछले सप्ताह उनकी सर्जरी सफल रही थी, लेकिन दुर्भाग्यवश बढ़ती उम्र के चलते उनका शरीर इस ऑपरेशन को नहीं झेल सका। अनुष्का के अलावा रवि शंकर की दूसरी बेटी नोरा जोन्स भी संगीत की दुनिया में अब बड़ा नाम बन चुकी हैं। 1999 में भारत रत्न से सम्मानित रवि शंकर ने अमेरिका और भारत दोनों को अपना घर बना रखा था।

उन्हें तीन बार ग्रैमी अवार्ड से भी नवाजा गया। उन्होंने आखिरी बार कैलिफोर्निया में 4 नवंबर को बेटी अनुष्का के साथ आखिरी बार परफॉरमेंस दी थी। पहला ग्रैमी उन्हें 1967 में यहूदी मेनुहिन के सहयोग से तैयार अलबम ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ के लिए मिला। मैगसायसाय अवार्ड विजेता शंकर 1986 में राज्यसभा सदस्य भी रहे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत राजनेताओं और कलाकारों ने रवि शंकर के निधन पर गहरा दुख जाहिर किया है।

भाई के ट्रूप से की शुरुआत
7 अप्रैल, 1920 को वाराणसी में बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मे रवि शंकर चार भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके पिता झालावाड़ के महाराजा के मंत्री रहे थे। रवि शंकर अपने बड़े भाई उदय शंकर के ट्रूप से चर्चा में आए। यह ट्रूप यूरोप और अमेरिका समेत पूरी दुनिया का टूर करते हुए भारतीय शास्त्रीय संगीत पेश करता था।

उनकी कुछ बातें
ऑक्सीजन मास्क के साथ दी आखिरी प्रस्तुति
बीते 4 नवंबर को पंडित जी ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में अपनी बेटी अनुष्का के साथ आखिरी प्रस्तुति दी थी। सांस की तकलीफ के चलते उन्हें इस प्रस्तुति से पहले ऑक्सीजन मास्क का इस्तेमाल करना पड़ा था। पंडित जी की खराब तबीयत के चलते इस कार्यक्रम को पहले तीन बार टाला गया था।

लता और आशा की आवाज का कायल हूं
सितार सम्राट रवि शंकर महान गायिका लता मंगेशकर और आशा भोंसले के जबरदस्त प्रशंसक थे। एक समारोह के दौरान उन्होंने कहा कि लता और आशा बेहतरीन पार्श्व गायिका हैं। मुझे दोनों बहनों की गाई ठुमरी और गजलें बेहद पसंद हैं।

हर कंसर्ट से पहले होती है घबराहट
सितार के सम्मोहन से आत्मा में झंकार पैदा कर देने वाले रवि शंकर कहते थे कि उन्हें अपनी हर प्रस्तुति से पहले ठीक वैसी ही घबराहट होती है, जैसी कि पहली बार कार्यक्रम पेश करने वाले किसी कलाकार को होती है।

महान कंपोजर भी थे शंकर
शंकर ने बीटल्स, मेनुहिन, जीन पियरे रामपाल समेत कई दिग्गज कलाकारों के लिए कंपोजिंग करने के साथ ही भारत, कनाडा, यूरोप और अमेरिका में कई फिल्मों और बैले को भी कंपोज किया।

सुरों का सफर
जन्म: 7 अप्रैल, 1920 को वाराणसी में
पिता: श्याम शंकर प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे
माता: हिमाग्नीदेवी

परिवार
रवि शंकर ने दो शादियां कीं थी। पहली शादी अन्नपूर्णा से की। बाद में उनका तलाक हो गया और दूसरी शादी सुकन्या से हुई। सुकन्या से उनकी एक बेटी अनुष्का शंकर हैं। रवि शंकर का संबंध एक अमेरिकी महिला सू जोन्स से भी रहा, जिनसे उनकी बेटी नोरा जोन्स हुईं।

संगीत
शुरू में वह नृत्य में रुचि रखते थे लेकिन 18 वर्ष की उम्र में (1938) उन्होंने सितार सीखना शुरू किया और उस्ताद अलाउद्दीन खान से दीक्षा लेने मैहर पहुंचे। वैसे उन्होंने अपना पहला कार्यक्रम 10 साल की उम्र में 1939 में किया था। 1949 से 1956 के बीच ऑल इंडिया रेडियो के संगीत निदेशक रहे। देश से बाहर पहला कार्यक्रम 1954 में तत्कालीन सोवियत संघ में दिया। वर्ष 1966 में वह प्रसिद्ध संगीत ग्रुप बीटल्स से जुड़े। मोहम्मद इकबाल द्वारा रचित सारे जहां से अच्छा की धुन पंडित रविशंकर ने बनाई थी।

फिल्मों में
फिल्म ‘पाथेर पांचाली’, अनुराधा के साथ ही सत्यजीत रे निर्मित फिल्म ‘अपु-त्रयी’ के अलावा गुलजार की फिल्म ‘मीरा’ और रिचर्ड एटिनबरा की ‘गांधी’ में भी उन्होंने संगीत दिया।

राजनीति
1986 से 1992 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

सम्मान
1999 में भारत रत्न से नवाजा गया। उन्हें 14 मानद डॉक्टरेट, मैगसायसाय पुरस्कार, तीन ग्रेमी अवार्ड, पद्म भूषण, विभूषण से भी सम्मानित किया गया।
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