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देश नहीं भूल पाएगा इंदिरा गांधी की शहादत

नई दिल्ली/अवनीश पाठक

Updated Wed, 31 Oct 2012 11:29 AM IST
homage to indira gandhi on 28th death anniversary
31 अक्टूबर, 1984, इंदिरा के जीवन की आखिरी तारीख। आजाद हिन्दुस्तान तब तक कई तारीखें देख चुका था। चीन से हार, नेहरू की मौत, शास्त्री से छल, 71 की फतह, 75 की इमरजेंसी और आपरेशन ब्लू स्टार। आज उसे इंदिरा की शहादत देखनी थी।
लोहे के सांचे में ढाली गई एक ऐसी महिला की शहादत, जिसने इस मुल्क की उंगली थामकर उसे विश्व पटल पर खड़ा होना सिखाया और कभी जिन्होंने लोकतंत्र की गर्दन पर हाथ भी रखे, जहां उंगलियों के निशान अब भी दिख पड़ते हैं। इंदिरा की शहादत का वाकया भूले नहीं भूलता। दिल्ली की स्याह सडकों पर सर्दी दस्तक दे चुकी थी। इंदिरा सफदरजंग के बंगले से निकल रही थीं। वह उड़ीसा में चुनाव प्रचार के बाद 30 अक्टूबर को ही दिल्ली पहुंची थीं। थकान के कारण उन्होंने रोजमर्रा के कार्यक्रम रद्द करा दिये थे। वह दफ्तर जाने की तैयार में थीं। एक आयरिश डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर पीटर उस्तीनोव वहां उनका इंतजार कर रहे थे। वह इंदिरा पर एक डाक्यूमेंट्री बना रहे थे। फिल्म के लिए ही इंदिरा का एक इंटरव्यू रिकार्ड होना था।

इंदिरा निजी सचिव आरके धवन के साथ बंगले से निकलीं। वह एक, अकबर रोड की ओर बढ़ रही थीं। उनसे दो-तीन कदम पीछे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवान और आरके धवन चल रहे थे। सफदर जंग के बंगले से एक, अकबर रोड का दफ्तर महज एक गेट की दूरी पर है। हेड कॉन्सटेबल नारायण सिंह, जो अभी-अभी उनके साथ आया था, छाता लेकर पीछे-पीछे चल रहा था। इंदिरा दफ्तर के गेट के करीब पहुंचीं तो नारायण सिंह ने देखा कि वहां सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह तैनात है। पास ही में बने संतरी बूथ में कॉन्सटेबल सतवंत सिंह भी स्टेनगन के साथ मुस्तैद है।

इंदिरा गांधी को पास आता देख दोनों सुरक्षा गार्ड अलर्ट हो गए। उनकी सुरक्षा में फिलहाल दो ही सिख गार्ड थे। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद इंदिरा की सुरक्षा में तैनात सिख गार्ड्स हटा लिए गए थे। खुफिया एजेंसियों की सूचना के बाद एहतियातन ये कदम उठाया गया था। हालांकि जब इंदिरा को ये खबर लगी तो उन्होंने इसका विरोध किया और सभी सिख सुरक्षाकर्मी वापस बुला लिए थे। बेअंत सिंह को इंदिरा गांधी दस साल से जानती थीं। वह उनके पसंदीदा गार्ड में से एक था। जबकि सतंवत सिंह उनकी सुरक्षा में पांच महीने पहले ही आया था।

इंदिरा तेज कदमों से संतरी बूथ के पास पहुंच चुकी थीं। बेअंत सामने ही खड़ा था। इंदिरा की नजर उससे टकराई, उन्होंने खुद ही दोनों हाथ जोड़े और कहा-'नमस्ते'। 66 साल की इंदिरा का यह अंतिम शब्द था। बस पलक भर झपकी थी, अगले पल का किसी को अंदाजा नहीं था। बेअंत सिंह के सरकारी रिवाल्वर से धड़ाधड़ तीन गोलियां निकलीं। इर्द-गिर्द के लोग भौंचक्के रह गए। नांरगी प्रिंट की साड़ी सुर्ख हो चुकी थी। सतवंत ने अपनी स्टेनगन निकाली और जमीन पर गिरतीं इंदिरा गांधी पर गोलियों की बौछार कर दीं। एक-एक के बाद एक 28 गोलियां। कुल मिलाकर 31 गोलियों ने इंदिरा का जिस्म छलनी कर दिया। 31 अक्टूबर, 1984 की तारीख खून के रंग में रंग गई थी। अगले दिन अखबारों में काले रंग में खबर थीं -'प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या'।

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