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उत्तराखंड: ‘प्रवेशद्वार’ तो बदला तीर्थ पिछड़ गया

हरिद्वार/कौशल सिखौला

Updated Fri, 09 Nov 2012 08:28 AM IST
haridwar development as a pilgrim
राज्य के गठन के बाद शहर के तौर पर तो उत्तराखंड का प्रवेशद्वार जरूर विकसित हुआ लेकिन विश्वविख्यात तीर्थ का भला नहीं हो पाया। 12 वर्षों और उत्तराखंड बनने के 12 सालों में विकास का खास असर तीर्थ पट्टी पर नहीं पड़ा। वर्ष 1988 के अक्तूबर में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने हरिद्वार को सहारनपुर से अलग कर नए जनपद की घोषणा की थी। उससे दो वर्ष पहले हरिद्वार को तहसील बनाई गई थी। जहां तक नगर के दर्जे का सवाल है, तीर्थ होने के कारण इसका दर्जा पूरे देश में बहुत ऊंचाइयों पर था। वैधानिक दृष्टि से 1985 से पूर्व हरिद्वार परगना भी नहीं था। तब तक हरिद्वार का परगना ज्वालापुर को माना जाता था जो आज तक भी कायम है।
वर्ष 1988 में अलग जिला बनने के बाद हरिद्वार की काया पलटती चली गई। जिला मुख्यालय भेल से आगे बनाया जाना काफी मुफीद साबित हुआ और विकास की एक लहर चल पड़ी। 12 वर्ष बार उत्तराखंड बनने पर जब हरिद्वार नए राज्य में शामिल हुआ तो उसी क्षेत्र में उद्योगों की बहार आ गई। उत्तराखंड में मिलाने का कड़ा विरोध करने वाले हरिद्वार को संभवत: नए राज्य में शामिल होने का सर्वाधिक फायदा हुआ। 12 से हरिद्वार का नाता पुराना रहा है। प्रत्येक 12 वर्ष बाद कुंभ आता है और हरिद्वार की काया पलटती है। पिछले 24 वर्षों में जहां तक तीर्थ का सवाल है, तीर्थ बिल्कुल नहीं बदला। हरकी पैड़ी पर कोई भी विस्तार 1986 के बाद नहीं हुआ। गंगा क्षेत्र के घाट, पुराने बाजार, मंदिर आदि जस के तस हैं।

ऐतिहासिक सतीकुंड और भीमगोडा कुंड का कोई विकास नहीं हुआ। कनखल में चित्रकारी वाली किसी भी इमारत को जीर्णोद्धार के लिए नहीं छेड़ा गया। कई उन प्राचीन मंदिरों का विकास नहीं हुआ, जो पौराणिक महत्व रखते हैं। माया देवी, बिल्वकेश्वर, नीलेश्वर, गौरीशंकर आदि निजी क्षेत्र की संपत्ति होने के कारण जस के तस बने हुए हैं। राज्य में शामिल होने अथवा अलग जनपद बनने का कोई लाभ पौराणिक क्षेत्रों को नहीं मिला। विकास की आंधी से तीर्थ तो अछूता रह गया।

बाहरी लीपापोती होती रही

हरिद्वार की बाहरी लीपापोती पिछले 24 वर्षों से होती रही है। यह वास्तविकता है कि जहां अध्यात्म बसता है, वहां भारी विकास की आवश्यकता है। पौराणिक तीर्थ के बिंदु-बिंदु को विकसित किया जाना चाहिए। जब तक हरिद्वार समग्र रूप से विकसित नहीं होगा, तब तक विकास की आंधी का शोर मचाना बेमानी है।
-स्वामी राजराजेश्वराश्रम, जगद्गुरु शंकराचार्य

तीर्थ से है हरिद्वार का नाम

हरिद्वार का नाम उद्योगों अथवा विकास की धारा से नहीं बना है। हरिद्वार देश की प्राचीन सप्तपुरियों में से एक है। चूंकि यह तीर्थ है अत: भारत में नहीं विश्व भर में इसका नाम है। तीर्थ क्षेत्र को चिह्नित कर विकास किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से वर्ष 1986 के बाद विशुद्ध तीर्थ क्षेत्र में न के समान विकास हुआ है।
-वीरेंद्र श्रीकुंज, महामंत्री-गंगा सभा
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