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जनसत्याग्रहियों को ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ की घुट्टी

आशुतोष द्विवेदी/ब्रजेश चौहान/आगरा

Updated Wed, 10 Oct 2012 08:46 AM IST
government wants to agreement with jan satyagraha under common minimum program
2007 में कमेटी और नेशनल लैंड कौंसिल के लॉलीपाप से जल, जंगल, जमीन के आंदोलन की आग पर पानी डाल दिया गया था। इस बार भी कुछ ऐसी ही तैयारी है। केंद्र सरकार गंभीर मांगों पर कुछ खास सहमत नहीं है। हां, दोनों पक्षों में ग्वालियर से आगरा तक के सफर में अब एक ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ जैसी हवा बहने लगी है।
एक बार फिर सियासत दांव खेलती नजर आ रही है। आदिवासी और भूमिहीन जिस आस-उम्मीद के साथ जमीन के लिए पीड़ा सहते हुए आगरा तक पहुंचे, वह मांग कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के बिन्दुओं के बीच दम तोड़ती नजर आ रही है। अगर आगरा में ऐसे प्रोग्राम पर सत्याग्रहियों के अगुवा सहमत होकर वापस कूच करने का आदेश दे देते हैं तो यह उन भोले-भाले आदिवासियों, भूमिहीनों और गरीबों के साथ अन्याय ही होगा। आखिर ये दूसरी बार अपने अगुवाओं के कहने पर दिल्ली के सड़कों पर मर मिटने को जो निकले हैं।

एकता परिषद के सूत्र बताते हैं कि जिस तरह का मसौदा पहुंचा है उसमें कुछ खास नहीं। पहले की तरह इस बार भी प्रभावी समाधान देने के बजाए लटकाने की तैयारी है। एकता परिषद बार-बार कहती रही है कि जब सरकार औद्योगिक घरानों और खनन कंपनियों को जमीन छीन कर दे सकती है तो भूमिहीनों के लिए वन और अन्य जगह से जमीन की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती। वन संरक्षण, वन्य जीव-जंतु संरक्षण और पेसा जैसे कानूनों को आदिवासियों के अधिकारों पर कुठाराघात से क्यों नहीं रोका जाता और प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों और स्थानीय लोगों का हक क्यों नहीं है। कॉमन मिनिमम प्रोगाम में ऐसे गंभीर मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही है।

जिन मुद्दों को केंद्र द्वारा मान लिए जाने की बात कही जा रही है, वह इतने सामान्य हैं कि स्थानीय और राज्य प्रशासन के तहत ही आते हैं। इन मुद्दों पर तो सिर्फ स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार को बस प्रभावी क्रियान्वयन ही करना था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री आवास, पट्टे, मामलों को जल्द निपटारा और कब्जे हटवाने पर आदेश दे चुके हैं। बात केंद्र के उन कानूनों की है जो आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के हक में रोड़ा डालते हैं या केंद्र की वह नीतियां जो कॉरपोरेट व खनन कंपनियों का फायदा पहुंचाने के लिए आदिवासियों और ग्रामीणों के जमीन को अधिकारों पर तलवार चला देती हैं।
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