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नहाने लायक नहीं गंगा का पानी, कैसे करेंगे स्नान

मुलित त्यागी/गढ़मुक्तेश्वर

Updated Wed, 28 Nov 2012 08:03 AM IST
ganga is not good for bath
कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान बुधवार को है। उधर, पीसीआई से आई वैज्ञानिकों की टीम ने गढ़ गंगा के प्रदूषित जल को नहाने योग्य होने से भी इंकार किया है। इसी जल को गाजियाबाद के प्रदूषण अधिकारी ने नहाने लायक होने का दावा किया था।
कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में आई वैज्ञानिकों की टीम की जांच रिपोर्ट में गंगा जल में फीकल कॉलीफॉर्म (वैक्टीरिया), ईसी और डीओ की मात्रा को देखकर आश्चर्य जताया गया है। गढ़ गंगा में रासायनिक तत्वों की मात्रा हरिद्वार की अपेक्षा बहुत अधिक है।

चित्रकूट के बाद गढ़ के कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान मेले में पहली बार सेवियर संस्था के साथ पीसीआई देहरादून से आई वैज्ञानिकों की चार सदस्य टीम का दो दिन से गंगा जल पर परीक्षण चल रहा है। वैज्ञानिकों के दल ने गंगा जल में हुए कई परिवर्तन का खुलासा किया है।

टीम ने दावा किया कि गंगा का जल पीने और स्नान करने लायक भी नहीं रहा है। गंगा के पानी पर रिसर्च कर रही टीम के हेड डॉ. अनिल कुमार ने अमर उजाला को बताया कि पानी में पाया जाने वाला फीकल कॉलीफार्म जल जनित बीमारियों का 80 प्रतिशत कारक होता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से निर्धारित टोटल कॉलीफार्म की संख्या 50 से 500 एमपीएन प्रति 100 एमएल होनी चाहिए। चौंकाने वाली बात यह है कि गढ़ गंगा में एकमात्र फीकल कॉलीफार्म की संख्या 1500 एमपीएन प्रति 100 मिली ग्राम से भी अधिक है। जलीय जीवों के लिए नितांत आवश्यक डीओ (डिजोल्वड ऑक्सीजन) की मात्रा गढ़मुक्तेश्वर में हरिद्वार की अपेक्षा कम पाई गई है। यह हरिद्वार में 10.5 और गढ़ में 7.6 मिलीग्राम प्रति लीटर है।

टीम की रिपोर्ट के अनुसार, पानी में मिश्रित तत्वों को बताने वाली ईसी भी हरिद्वार से अलग है, जो हरिद्वार में 165 तो गढ़ में 252 पाई गई है। लिहाजा गढ़ गंगा में रासायनिक तत्वों की मात्रा हरिद्वार की अपेक्षा बहुत अधिक है। उन्होंने दावा किया कि इस स्थिति में गंगा का पानी पीने नहीं बल्कि स्नान योग्य भी नहीं रहा है। इससे मानव मित्र डॉल्फिन के जीवन को भी खतरा हो सकता है।

क्या है कारण
डॉ. अनिल बताते हैं कि वेदपुराण के उल्लेख को विज्ञान ने प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में रेडियोएक्टिव एलीमेंटस, वैक्टीरीया फोजेस, असंख्य मिनरल्स पाए जाते हैं, जो हिमालय पर मिलते हैं। जगह-जगह बांध बनने के कारण ये तत्व 90 प्रतिशत मात्रा में बांध पर रुक जाते हैं। नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) नागपुर ने इस बात को सिद्ध भी किया है। इसके अलावा विभिन्न केमिकल और रासायनिक पानी और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का पानी गंगा में डालने से इन तत्वों की मात्रा में अंतर आता जा रहा है।

रिपोर्ट पहुंचेगी गंगा बेसिन अथारिटी
डॉ. अनिल बताते हैं कि बुधवार को पूठ में गंगा जल पर रिसर्च की जाएगी। इसके बाद रिपोर्ट डॉ. रवि चोपड़ा (पीसीआई के निदेशक) के माध्यम से गंगा बेसिन अथारिटी को भेजी जाएगी। डॉ. रवि चोपड़ा गंगा बेसिन अथारिटी के सदस्य भी हैं। टीम में अन्य सदस्य रिसर्च असिस्टेंट मीना यादव, लैब अटेंडेंट रामसेवक गंगा के पानी पर रिसर्च कर रहे हैं।
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