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एफडीआई पर वोटिंग से पहले इस गणित को समझिए

नई दिल्ली/विजय जैन

Updated Tue, 04 Dec 2012 09:46 PM IST
fdi in retail mathematics of voting
मल्‍टीब्रांड रिटेल में एफडीआई पर लोकसभा में बहस जारी है। नियम 184 के तहत हो रही इस बहस के बाद कल वोटिंग की जायेगी। एफडीआई के मुद्दे पर विपक्षी दलों की ओर से मतविभाजन के प्रावधान वाले नियम के तहत लाए जाने वाले प्रस्ताव पर सरकार का आंकड़ों का गणित उलझ सकता है। वहीं, यूपीए सरकार ने नंबर पूरे होने का दावा किया है।
ये है लोकसभा और राज्यसभा का गणित
लोकसभा में कुल 544 सदस्य हैं। ऐस में सरकार का बहुमत 273 सांसदों के समर्थन से साबित होगा। यूपीए में शामिल पार्टियों को जोड़ने से सरकार का समर्थन बनता है 254। ये आंकड़ा कांग्रेस के 206, डीएमके के 18, एनसीपी के 9 और आरएलडी के पाचं और छोटी पार्टियों समेत निर्दलीयों के 16 सांसदों के समर्थन से पूरा होता है।

यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली पार्टियों के 50 सांसदों को जोड़ने से समर्थन हो जाता है 304। इसमें सपा के 22, बसपा के 21, आरजेडी के चार, जेडीएस के 3 सांसद हैं। अगर बसपा और सपा सरकार के खिलाफ न जाकर आखिरी समय में वोटिंग में हिस्सा न लें तो भी सरकार की मदद हो जाएगी।

दोनों पार्टियां वोटिंग से अलग हुईं तो 501 सांसदों के बीच वोटिंग होगी और बहुमत का आंकड़ा 252 वोटों का रह जाएगा। इतने वोट के लिए सरकार को बाहरी समर्थन की भी जरूरत नहीं रहेगी। यूपीए में शामिल पार्टियों के 254 सांसद ही नैया पार लगा देंगे।

राज्यसभा के आंकड़े
राज्यसभा में कुल 244 सांसद हैं। इसमें कांग्रेस के 70 वोट हैं। सरकार में शामिल एनसीपी के सात, डीएमके के सात, नेशनल कांफ्रेंस के 2, एसडीएफ, एनपीएफ, केसीएम और बीडीएफ के पास एक-एक सांसद हैं। चार निर्दलीय सांसदों को मिलाकर सरकार का आंकड़ा हो जाता है 94 वोट।

सरकार को बाहर से समर्थन दे रही बसपा के 15, सपा के नौ, आरजेडी के दो और एलजेपी का एक सांसद है। चार निर्दलीयों के वोट मिलाकर वोट हो जाते हैं 31।  इनको जोड़कर सरकार का आंकड़ा 125 का हो जाता है। मतलब इस हालत में सरकार को आसानी से राज्यसभा में बहुमत मिल जाएगा।

अगर बसपा के 15 और सपा के नौ सांसद वोटिंग में भाग नहीं लेते हैं तो सदन की कुल संख्या 220 होगी। इस स्थिति में यूपीए के 94 और बाहरी समर्थन के 7 वोट मिलाकर भी 101 वोट होते हैं। यानी बहुमत से 10 कम। ऐसे में सरकार की नजर 10 नामांकित और तीन अन्य सांसदों पर होगी।

तेलंगाना सांसद बिगाड़ सकते हैं खेल
रिटेल में एफडीआई पर संसद में चर्चा और वोटिंग से पहले तेलंगाना से कांग्रेसी सांसदों ने यूपीए सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। तेलंगाना के नौ कांग्रेसी सांसद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ की ओर से बुलाई गई बैठक में नहीं गए। कमलनाथ ने संसद में वोटिंग के दौरान इनसे समर्थन का वादा लेने के लिए बैठक बुलाई थी। अगर ये सांसद एफडीआई के प्रस्ताव के खिलाफ वोट करते हैं तो सरकार का नंबर गेम बिगड़ सकता है।

मीटिंग में नहीं जाने वाले सांसदों ने यह साफ नहीं किया है कि वोटिंग के दौरान वे संसद से गैर हाजिर रहेंगे या नहीं। इन सांसदों ने कहा है कि इस पर फैसला बुधवार को लिया जाएगा। सांसदों की शिकायत है कि कांग्रेस और सरकार तेलंगाना के मामले पर गंभीरता से विचार नहीं कर रही है।

इन्होंने चेताया कि अगर नौ दिसंबर तक अलग तेलंगाना राज्य पर फैसला नहीं हुआ तो वह पार्टी छोड़ देंगे। करीमनगर से कांग्रेसी सांसद पूनम प्रभाकर और निजामाबाद से सांसद मधु गौड़ साक्षी ने कहा कि हमने सामूहिक रूप से बैठक के बहिष्कार का फैसला लिया है। बैठक में सिर्फ  दो मंत्री ही शामिल हुए।

वोटिंग में हारे, तब भी एफडीआई
ऐसा नहीं है कि सरकार संसद में बहस में हार जाए तो एफडीआई की नीति लागू नहीं होगी। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मल्टी ब्रैंड रीटेल में एफडीआई का फैसला एग्जिक्यूटिव ऑर्डर है इसलिए अगर संसद में सरकार इस मुद्दे पर बहुमत नहीं जुटा पाती, तब भी यह जरूरी नहीं कि एफडीआई का फैसला उसे वापस लेना ही होगा। लोकसभा में सरकार के पास संतोषजनक नंबर हैं। मगर राज्यसभा में वह अल्पमत में है।

माया-मुलायम का तिलिस्म
ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने के बाद अचानक यूपीए सरकार में एसपी और बीएसपी की पूछ बढ़ गई है। दोनों पार्टियां यूपीए सरकार से जमकर फायदा उठाना चाह रही हैं। संकट यह है कि माया और मुलायम के फायदे आपस में टकराते हैं। जिससे मायावती को फायदा होगा उससे मुलायम सिंह को नुकसान।

इस वजह से कांग्रेस पूरी तरह ब्लैकमेल होने से बच जा रही है। मुलायम यूपी के लिए बड़े पैकेज और सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण न देने का दबाव बना रहे हैं। मायावती चाहती हैं कि एफडीआई पर समर्थन के एवज में प्रमोशन में रिजवेर्शन बिल मंजूर किया जाए।
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