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आगरा में पड़ाव, फिर वार्ता और समझौता!

आशुतोष द्विवेदी/आगरा

Updated Mon, 08 Oct 2012 11:18 AM IST
farmers likely to rest negotiation possible
यह बहुत हद तक संभव है कि जनसत्याग्रह का सैलाब आगे बढ़े ही नहीं और ताजनगरी में समझौता हो जाए। क्योंकि केंद्र सरकार भी नहीं चाहेगी इतना बड़ा जनसैलाब दिल्ली पहुंचे। ग्वालियर से कूच के दौरान केंद्रीय पर्यावरण और वन राज्यमंत्री जयराम रमेश से तो वार्ता विफल हो गई थी। मगर आगरा तक की यात्रा के बीच जयराम रमेश और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और केंद्रीय राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार यात्रा के अगुवा पीवी राजगोपाल से संपर्क में हैं। स्वामी अग्निवेश भी अहम भूमिका में हैं। यह सब खुद जनसत्याग्रह के संयोजक पीवी राजगोपाल भी स्वीकारते हैं।
राजगोपाल बताते हैं कि वैसे तो कूच के दौरान ही केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश से तीन मुख्य मांगों पहली- केंद्र से भूमि सुधार नीति बनवाना, दूसरी आदिवासी, भूमिहीनों, दलितों और वंचित समाजों को आवासीय पट्टा दिलाना और तीसरी आदिवासियों के लिए बने कानूनों से अन्य कानूनों का अधिपत्य समाप्त करने आदि पर सहमति बन गई थी। फिर अचानक न जाने क्या हुआ और जयराम रमेश मुकर गए...संभवत: उनके पास कहीं से फोन आया था, लेकिन दिल्ली में जनसैलाब को रोकने के डर से वह फिर संपर्क में हैं।

राजगोपाल ने कहा कि मैं भी इसी आशा में हूं कि आगरा में तीन दिन के प्रवास (8, 9 और 10 अक्तूबर) और सभा के दौरान एक बार केंद्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री हमारे मंच पर होंगे और इन मुद्दों पर लिखित समझौते पर हस्ताक्षर कर हो जाएंगे। वह यह भी कहते हैं कि इन मुद्दों पर असहमति जैसी कोई बात नहीं है। 2007 में यह सब मान लिया गया था, उसके बाद कुछ किया नहीं गया। सभी संबंधित मंत्री कहते हैं कि मैं अब आया हूं, मुझे समझने दीजिए। अगर कोई जल्दी समझ ले और एक कारगर कदम उठा ले तो बात बड़ी नहीं है।

अन्ना, रामदेव और अरुणा राय भी होंगे साथ
अन्य आंदोलनकर्ताओं को साथ लेने के सवाल पर पीवी राजगोपाल कहते हैं कि आगरा में अगर वार्ता फेल होती है तो फिर यह जनसत्याग्रह जनसमुद्र सत्याग्रह में बदल जाएगा। अन्ना, बाबा रामदेव और अरुणा राय भी साथ होंगे, इन सबसे संपर्क बना हुआ है। इसके अलावा वह इस महा मार्च में अन्य सैकड़ों जत्थों के भी जुड़ने की बात करते हैं, जो आगरा और उसके बात शामिल हो जाएंगे।

मजबूरी में फिर करनी पड़ी यह पदयात्रा
2007 में हुई पदयात्रा और दिल्ली में 25 हजार लोगों के बीच केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री ने इन मांगों का मान लिया था। एक कमेटी बना दी थी, कमेटी ने छह माह में 300 सुझाव भी दे दिए। इसके बाद कई बार कहने पर नेशनल लैंड कौंसिल बना दी गई, प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं पर आज तक एक भी बैठक नहीं हुई। राजू भाई पीवी (राजगोपाल) कहते हैं कि आमजन की आवाज को न सुनने वाली सरकार के इस रवैये के चलते ही दुबारा सड़क पर सैलाब के साथ उतरना पड़ा।
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