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सादगी व सरलता के मिसाल थे राजेन्द्र बाबू

चंदन जायसवाल/नई दिल्ली

Updated Mon, 03 Dec 2012 10:47 AM IST
Epitomized simplicity and ingenuity first President Rajendra Babu
कहते हैं कि प्रत्येक चमकने वाली वस्तु सोना नहीं हुआ करती। इसी तरह साधारण दिखने वाले व्यक्ति में कितना असाधारण व्यक्तित्व छिपा है, कोई इसका अंदाजा नहीं लगा सकता। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति स्व. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं। उन्होंने जो कहा, उसे अपने जीवन में उतारा भी। वे उन नेताओं में से नहीं थे, जो लफ्फाजी द्वारा मानवीय आदर्शों की खरीद-फरोख्त करते हैं।
उन्होंने महात्मा गांधी की अध्यात्मनिष्ठ राजनीति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और उसी में आदर्श भारत के विकास तथा उन्नति का स्वप्न देखा। बिहार की धरती पर यूं तो और भी कई महापुरुषों का जन्म हुआ है पर राजेन्द्र प्रसाद को बिहार का गौरव माना जाता है। इन्हीं संस्कारों का नतीजा था जो राजेन्द्र प्रसाद जी में सादगी और सहजता के गुणों का सृजन हुआ।

आज उनका जन्म दिन है। 3 दिसम्बर 1884 को बिहार के सारण जिला (अब सीवान) के जीरादेई में जन्में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने एक किसान परिवार से होने के कारण जीवन की हर कड़वी सच्चाई को नजदीक से देखा था। उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत एवं फारसी के विद्वान थे एवं उनकी माता श्रीमती कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं जिनके संस्कारों में पलकर राजेन्द्र प्रसाद का बचपन बीता।

स्व. राजेन्द्र बाबू की आरंभिक शिक्षा ज़िला स्कूल छपरा तथा उच्च शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज कोलकाता में हुई। इसी प्रेसीडेंसी कालेज में परीक्षा के बाद बाबू राजेंद्र की उत्तर-पुस्तिका जाचते हुए परीक्षक इतना प्रभावित हुए कि उनकी उत्तर-पुस्तिका पर ही लिख दिया कि 'The examinee is better than the examiner' यानी परीक्षार्थी, परीक्षक से भी बेहतर है।

बाबू राजेन्द्र की प्रतिभा दिन पर दिन निखरती गई और 1915 में उन्होंने विधि परास्नातक की परीक्षा स्वर्ण-पदक के साथ हासिल किया। इसके बाद कानून के क्षेत्र में उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि भी हासिल की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद वह मुजफ्फरपुर में शिक्षक बने। उनकी ख्याति आदर्श शिक्षक के रूप में थी। बाद में उन्होंने वकालत शुरु किया और पटना हाईकोर्ट में कम फीस पर अवश्य मुकदमा जीतने वाले वकील के रूप में चर्चित हो गए।

1920 में वे वकालत छोड़ गांधी जी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने गांधी जी का संदेश बिहार की जनता के समक्ष इस तरह से प्रस्तुत किया कि वहां की जनता उन्हें ‘बिहार का गांधी’ ही कहने लगी।

देश के स्वतंत्र होने पर उन्हें प्रथम राष्ट्रपति पद पर सबने चुना और दूसरी बार भी चुने गए। राष्ट्रपति पद पर वह अत्यंत सादगी से रहते थे। सन् 1962 में इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न की उपाधि से नवाजा। राजनीति से सन्यास लेने के बाद राजेन्द्र प्रसाद ने अपना जीवन पटना के सदाकत आश्रम में बिताया जहां 28 फरवरी, 1963 को उनका निधन हो गया।

राजेन्द्र प्रसाद का नाम स्वतंत्रता संग्राम में बेहद सम्मान से लिया जाता है, जिन्होंने राजनीति में होते हुए भी इससे दूरी बना जनता की सहायता में अपना अधिक समय लगया। अन्य नेताओं की तरह वह जन चेतना जगाने की बजाय जनहित के कार्यों में अधिक ध्यान देते थे, यही वजह थी कि उन्हें सबसे अलग माना जाता था।

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