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दुनिया देखेगी 25 हजार लोगों का आमरण अनशन

आगरा/आशुतोष/ब्यूरो

Updated Mon, 08 Oct 2012 02:56 PM IST
country will witness agitation till death of 25 thousand farmers
अन्ना के अनशन के बाद दुनिया दिल्ली से 25 हजार से अधिक लोगों का अनशन देखने वाली है। जल, जंगल और जमीन के सवाल पर ग्वालियर से निकली जनसत्याग्रह पदयात्रा अनुशासित है, गांधीवादी होने का दम भी भर रही है पर 2007 की यात्रा के बाद केंद्र सरकार द्वारा दिखाए ठेंगे से आहत है। अन्ना और रामदेव के आंदोलनों का हश्र भी देख चुकी है, इसलिए इस बार इरादा दूसरा है। वह बिना लिखित समझौते के लौटने वाली नहीं। यह महापदयात्रा आगरा से 11 अक्तूबर को दिल्ली की ओर कूच करेगी।
सत्याग्रही असम की निभा, मध्यप्रदेश की बीना, छत्तीसगढ़ के प्रकाश के साथ पदयात्रा की संयोजक एकता परिषद के प्रमुख पीवी राजगोपाल कहते हैं इस बार पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 29 अक्तूबर को दिल्ली पहुंचकर एक दिन इंतजार करेंगे। दूसरे दिन यानी 30 अक्तूबर से सभी लोग मुंह में अन्न का दाना तक डालना बंद कर देंगे और सरकार ने मांगें नहीं मानीं तो दिल्ली की सड़कों पर ही दम तोड़ देंगे।

अब आश्वासन से छले जाने को तैयार नहीं
हिंसा से बचना है तो भूमि समस्या हल करो, जमीन की लड़ाई में सारी दुनिया आई है के नारों के बीच जन सत्याग्रहियों का मार्च रविवार को धौलपुर-आगरा की सीमा तक पहुंच गया। हजारों की तादाद में भूमिहीन और अदिवासी बढ़े आ रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि सरकार सुनेगी और उन्हें जमीन मिलेगी। फिर सियासी आश्वासन के छल से आशंकित होने के बावजूद हौसला बुलंद है। सत्याग्रही कहते हैं कि ‘जमीन लेकर ही आएंगे नई तो वही भूक्खों मर जान दे देवै।’ यानि इशारा अन्ना की तरह अनशन का, जिसमें एक दो नहीं हजारों पेट अन्न त्याग देंगे।

गांधीवादी राजगोपाल पी वी के नेतृत्व में चल रहे जन सत्याग्रह 2012 के दिल्ली कूच में ‘हिंसा से बचना है तो भूमि समस्या हल करो’ का नारा चौंका रहा है। मार्च में शामिल हजारों लोगों की ओर से एक चेतावनी भी भविष्य की ओर इशारा कर रही है। रविवार को धौलपुर सीमा में बोथपुरा में सत्याग्रहियों के पहले जत्थे का पड़ाव था। पूर्वान्ह 11 बजे कुछ सत्याग्रही स्नान कर रहे थे तो कुछ आराम। खाना बनाने की तैयारियों में कुछ लोग जुटे थे।
यहीं तिगरा तालपुरा गांव निवासी सत्तर वर्षीय सहरिया अदिवासी सीताराम से पूछा गया कि क्या इस मार्च से जमीन मिलेगी। सवाल पर पास में बैठी 65 साल की बनेशी बोल उठीं, ‘महंगाई बढ़ गई, भ्रष्टाचार है। काम न मिलै है, जंगल में रह रहै हैं, मिलेगी तो ठीक न मिली तो ठीक।’ तभी पास बैठी द्रोपदी ने कहा, ‘अब दिल्ली में जाकर हम लठ्ठ तो चलानै के नहीं।’ सीताराम कहते हैं, ‘हमारी आत्मा और परमात्मा सब देख रहे हैं।’

जत्थे में शामिल मानपुर गांव शिवकुटी के चंद्र शेखर पटेल कहते हैं कि ‘पहले भी दिल्ली गए थे, वायदा पूरा नहीं किया। इस बार जमीन लेकर ही आयगैं। पहले दिन तो दिल्ली में खाना खा लेंगे, फिर भूख हड़ताल कर देंगे।’  शाहडोल के विश्वनाथ को उम्मीद है कि एक न एक दिन जमीन जरूर मिलेगी। जत्थे के साथ तेज कदमों के साथ चल रही ग्वालियर की 60 वर्षीय हरसी कहती हैं कि इस बार जमीन नहीं मिली तो वह दिल्ली में ही ‘भूक्खों’ मर जाएंगी। उमरियां मध्यप्रदेश के पडौली गांव की सरोज साफ करती हैं कि अब दिल्ली वे दिल्ली के वायदों पर नहीं बहलेंगे। असम से आईं त्रिवेणी भी कुछ ऐसा ही बताती हैं।

आंदोलन की अगुवाई कर रहे राजगोपाल पी वी का कहना है कि सरकार किसानों की जमीन जबरन छीनकर उद्योगपतियों को दे सकती है तो इन गरीबों को क्यों नहीं। अदिवासी कानून पर दूसरे कानून भारी हैं, लेकिन अब आश्वासनों से काम नहीं चलने वाला है। पांच साल पहले भी जो कहा गया था, वो पूरा नहीं हुआ।

गीतों से जमीन की पीड़ा बयां करते चले सत्याग्रही
दिल्ली की ओर मार्च कर रहे सत्याग्रही लोकगीतों के माध्यम से जमीन और जंगल की पीड़ा को बयां करते चल रहे हैं। परंपरागत लोकनृत्य और वेशभूषा में सत्याग्रही आदिवासी नजर आए। सिर पर घड़े और पेड़ रखे सत्याग्रही पूरे मार्च की अगुवाई करते चल रहे थे। जल, जंगल और जमीन यह सब जनता के अधीन करने की मांग करते इसके लिए आधी रोटी खाने की स्थिति तक संघर्ष करने को तैयार थे।

नारे लगा रहे थे ‘दिल्ली जाएंगे, आधी रोटी खाएंगे’। ढोल मृदंग बजाते हुए ‘महलों को छोड़कर झोपड़ी में रहियों’ गीत के साथ महिलाएं सत्याग्रहियों का जोश बढ़ा रही थीं। वहीं ‘कूह कूह बोले पपीहा’ लोकगीत मनोरंजन के साथ उनकी थकान को दूर कर रहा था और महिलाएं इसके बोल पर थिरकती हुई आगे बढ़ रही थीं।

धौलपुर के थाना मनिया क्षेत्र में इनके गुजरने के बाद महिलाओं का एक और जत्था आया। जल, जंगल जमीन की लड़ाई पर रचा गया गीत ‘दिल्ली जाना है, हक हमै अपनों है पानै, जनता जानै है, ग्वालियर से दिल्ली जानै है, हक हमै अपना जानै है’ गाते हुए यह महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। एक अन्य गीत ‘दिल्ली में झंडा फहराने आईयौ’ भी सत्याग्रही गाते चले जा रहे थे। बुजुर्ग महिला और पुरुष भी लोकगीतों को गुनगुनाने और उन पर झूमने में पीछे नहीं थे।
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