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संसद हमले की 11वीं बरसी पर देश को इंसाफ का इंतजार

चंदन जायसवाल/नई दिल्ली

Updated Thu, 13 Dec 2012 08:32 AM IST
country await justice on parliament attack anniversary
आज संसद पर हमले के 11 साल पूरे हो गए। 13 दिसंबर, 2001 को दिन में करीब पौने बारह बजे देश की सर्वोच्च संस्था और लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन पर आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी थी। संसद पर हुए हमले की खबर ने सबको हैरान ही नहीं बल्कि हिलाकर रख दिया था।
जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के इस हमले का संसद परिसर में तैनात सुरक्षा बलों ने बहादुरी से मुकाबला करते हुए सभी आतंकियों को मार गिराया था। इस हमले में हैंड ग्रेनेड और एके-47 से लैस पांच आतंकी शामिल थे। लोकतंत्र पर हुए इस सबसे बड़े हमले में दिल्ली पुलिस के पांच जवान, सीआरपीएफ की एक महिला कांस्टेबल, संसद के दो गार्ड, संसद में काम कर रहा एक माली और एक पत्रकार शहीद हो गए थे।

जिस समय ये हमला हुआ था, संसद में कई वरिष्ठ मंत्रियों समेत तकरीबन दो सौ संसद सदस्य मौजूद थे। इसे एक तरह से संसद पर नहीं, देश की संप्रभुता पर भी हमला कहा जा सकता है।

गौरतलब है कि 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले की साजिश रचने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2005 को अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई थी और कहा था कि 20 अक्टूबर 2006 को अफजल को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाए। लेकिन इसके ठीक पहले तीन अक्टूबर 2006 को अफजल की पत्नी तब्बसुम ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर दी।

छह साल बाद भी कोई फैसला नहीं
आज छह साल के बाद भी इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। राष्ट्रपति ने इस दया याचिका पर गृह मंत्रालय से राय मांगी। मंत्रालय ने इसे दिल्ली सरकार को भेज दिया, जहां दिल्ली सरकार ने इसे खारिज करके गृहमंत्रालय को भेजा। गृहमंत्रालय ने भी दया याचिका पर फैसला लेने में काफी वक्त लगाया। अब अंतिम फैसला राष्ट्रपति को लेना है।

अफजल गुरु को फांसी मिलने में हो रही देरी से नाराज शहीदों के परिजनों का न तो दर्द कम हुआ है न ही उनके परिवार की सरकार ने सही तरह से सुध ली है। नाराज शहीदों के घर वालों ने बहादुरी के तमगे भी लौटा दिए। बावजूद इंसाफ पाने का उनका इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ है। सभी को आज भी न्याय का इंतजार है।

13 दिसंबर को संसद हमले की बरसी पर पूरा भारत उन शहीदों को नमन कर रहा है, जिन्होंने अपने देश की रक्षा के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी।
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