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गुजरात चुनाव : हावी रहेंगे जाति समीकरण

नोएडा/इंटरनेट डेस्क

Updated Sun, 25 Nov 2012 11:53 AM IST
caste equation will continue to dominate gujarat election
गुजरात विधानसभा के दिसंबर में होनेवाले चुनाव में इस बार भी जाति समीकरण हावी रहने की संभावना है। 70 फीसदी पटेल मतदाताओं में से ज्यादातर पर भाजपा की पकड़ है, लेकिन केशूभाई पटेल के मैदान में उतरने से किसे कितना नफा-नुकसान होता है यह 20 दिसंबर को सामने आएगा।
देशभर में जातिवाद के आधार पर लडे जाते चुनावों से अब गुजरात भी अछूता नहीं है। कांग्रेस माधवसिंह सोलंकी ने 1985 में क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम (केएचएएम) ‘खाम’ थियरी अपनाई और गुजरात विधानसभा की 182 में से 149 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, लेकिन 1990 में कांग्रेस के पूर्व नेता और मुख्यमंत्री चिनभाई पटेल गुजरात जनता दल का गठन कर भाजपा की मदद से सत्ता प्राप्त करने में सफल रहे। इसी दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन ने राज्य के जाति आधारित राजनीति को छिन्न-भिन्न कर दिया।

वर्ष 1995 के दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर बही हिन्दुत्व की लहर में भाजपा ने गुजरात की सत्ता प्राप्त की। 1998 के बाद 2002 में भाजपा का गोधरा कांड और दंगों का राजनीतिक लाभ मिला। हांलाकि 2007 के विधानसभा चुनाव तक हिन्दुत्व का मुद्दा खत्म हो चुका था। जिससे भाजपा ने जाति के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया और गुजरात में सत्ता बरकरार रखी। अबकि बार जाति समीकरण ही चुनाव में पर हावी रहने की संभावना है।

गांधीनगर की गद्दी पाने के लिए पाटीदारों के वर्चस्व को बहुत बड़ा राजनीतिक समीकरण माना जाता है। राज्य में जातिवार मतदाताओं पर नजर करें तो ओबीसी के कुल 1.28 करोड़ मतदाता हैं। जिनमें ठाकोर, कोली, सुथार, दर्जी जैसी कई जातियां शामिल हैं। लेकिन सबसे अधिक मतदाता पाटीदार जाति के ही हैं। जबकि ब्राह्मण और जैन मतदाताओं की संख्या 47 लाख है। इसके अलावा 51 लाख आदिवासी, 30.69 लाख दलित तथा 41 लाख मुस्लिम मतदाता हैं।

एक समय था जब गुजरात की राजनीति में ब्राह्मण और जैनों का प्रभुत्व था। वर्ष 1960 से अब तक सबसे अधिक शासन ब्राह्मण और वणिक मुख्यमंत्रियों ने ही किया है, जिसमें ब्राह्मण और वणिक के सात मुख्यमंत्री शामिल हैं। जबकि पटेल और ओबीसी जाति के तीन-तीन मुख्यमंत्रियों ने गुजरात में शासन किया है।
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